*पटना, 7 मई 2025* – बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियों के बीच रुद्र रिसर्च एंड एनालिटिक्स द्वारा किए गए एक ताजा ओपिनियन पोल ने राज्य की सियासी हवा में बड़े बदलाव के संकेत दिए हैं। इस सर्वे में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री की पसंद के मामले में सबसे आगे निकल गए हैं, जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लोकप्रियता में भारी गिरावट दर्ज की गई है। सर्वे के नतीजों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के लिए खतरे की घंटी बजा दी है, क्योंकि विपक्षी महागठबंधन (MGB) ने मजबूत चुनौती पेश की है। बिहार की जनता ने इस बार बड़ा खेल खेला है, और सर्वे के परिणामों ने सभी को हैरान कर दिया है।
#### सर्वे का आधार: रुद्र रिसर्च की विश्वसनीयता
रुद्र रिसर्च एंड एनालिटिक्स ने यह सर्वे 15 अप्रैल से 30 अप्रैल 2025 तक बिहार के सभी क्षेत्रों में किया। इसमें 243 विधानसभा क्षेत्रों से विभिन्न जातियों और समुदायों के लोगों को शामिल किया गया। सर्वे में 50,000 से अधिक लोगों की राय ली गई, जिससे यह बिहार की सियासी तस्वीर को समझने का एक व्यापक आधार प्रदान करता है। सर्वे का उद्देश्य यह जानना था कि बिहार की जनता का मूड क्या है और वे किसे अगला मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं।
#### तेजस्वी यादव की उभरती लोकप्रियता
सर्वे के अनुसार, तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री की पसंद के मामले में सबसे आगे हैं। 35.5% लोगों ने उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में देखने की इच्छा जताई, जो फरवरी 2025 के 40.6% से थोड़ा कम है, लेकिन फिर भी वे पहले स्थान पर बने हुए हैं। तेजस्वी ने युवा-केंद्रित नीतियों, रोजगार सृजन और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर जोर देकर युवा मतदाताओं का समर्थन हासिल किया है। उनकी पार्टी RJD को सर्वे में 28% वोट शेयर मिला है, जो उसे सबसे बड़ी एकल पार्टी बनाता है।
तेजस्वी की बढ़ती लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि उन्होंने गैर-यादव ओबीसी और कुशवाहा समुदायों में अपनी पैठ बनाई है, जो पहले नीतीश कुमार का मजबूत आधार थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में RJD ने कुशवाहा वोटरों को आकर्षित करने में सफलता हासिल की थी, और यह रुझान अब विधानसभा चुनाव में भी दिखाई दे रहा है।
#### नीतीश कुमार की गिरती साख
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो दशकों से बिहार की राजनीति का एक बड़ा चेहरा रहे हैं, इस सर्वे में तीसरे स्थान पर खिसक गए हैं। फरवरी 2025 में 18% लोग उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते थे, जो अप्रैल तक घटकर 15% रह गया। सर्वे में 58% लोगों ने कहा कि नीतीश की विश्वसनीयता में भारी कमी आई है, जबकि 13% ने कहा कि यह कुछ हद तक कम हुई है। केवल 21% लोगों ने उनकी साख में कोई कमी न होने की बात कही।
नीतीश की गिरती लोकप्रियता के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण उनकी बार-बार गठबंधन बदलने की रणनीति है, जिसने उनकी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है। 2022 में उन्होंने NDA छोड़कर महागठबंधन के साथ सरकार बनाई, लेकिन 2024 में फिर से NDA में वापस आ गए। इस लगातार बदलाव ने मतदाताओं में भरोसे की कमी पैदा की है। इसके अलावा, नीतीश की उम्र और स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं भी बढ़ रही हैं। हाल के महीनों में उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों में कमी और रैलियों में कमजोर उपस्थिति ने इन अटकलों को हवा दी है।
#### प्रशांत किशोर का उभरता प्रभाव
सर्वे में एक आश्चर्यजनक नाम प्रशांत किशोर का भी उभरकर सामने आया है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर को 17.2% लोगों ने मुख्यमंत्री के रूप में पसंद किया, जो फरवरी 2025 के 14.9% से एक उल्लेखनीय वृद्धि है। प्रशांत किशोर ने बिहार में वैकल्पिक राजनीति की बात करके और युवाओं व मध्यम वर्ग को आकर्षित करके अपनी स्थिति मजबूत की है। हालांकि, उनकी पार्टी का वोट शेयर अभी भी सीमित है, लेकिन उनका प्रभाव बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है।
#### NDA की स्थिति: एकजुटता की चुनौती
रुद्र रिसर्च के सर्वे के अनुसार, NDA को 46% वोट शेयर मिलने का अनुमान है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 25%, जनता दल (यूनाइटेड) (JDU) को 16%, और चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) को 5% वोट शेयर शामिल है। दूसरी ओर, महागठबंधन (MGB) को 35% वोट शेयर मिलने का अनुमान है, जिसमें RJD को 28% और कांग्रेस को 7% वोट शेयर मिला है।
हालांकि NDA अभी भी वोट शेयर के मामले में आगे है, लेकिन इसकी एकजुतता पर सवाल उठ रहे हैं। BJP के भीतर नीतीश कुमार की भूमिका को लेकर असंतोष है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा कि BJP नेता सम्राट चौधरी बिहार में “विजय का झंडा फहराएंगे,” जिससे यह अटकलें शुरू हो गईं कि क्या BJP नीतीश को दरकिनार करने की योजना बना रही है। इस बयान के बाद RJD ने तंज कसते हुए पूछा कि क्या BJP ने नीतीश को छोड़ दिया है, जिसके जवाब में BJP को सफाई देनी पड़ी।
#### महागठबंधन की रणनीति: एकजुटता और चुनौतियां
महागठबंधन, जिसमें RJD, कांग्रेस और वामपंथी दल शामिल हैं, ने इस सर्वे में 35% वोट शेयर हासिल किया है। हालांकि, गठबंधन के भीतर सीट-बंटवारे को लेकर तनाव है। कांग्रेस और वाम दलों को डर है कि RJD आखिरी समय तक सीट-बंटवारे को लटकाकर उन्हें कमजोर सीटें दे सकती है। 2020 के चुनावों में कांग्रेस को 70 सीटें दी गईं, लेकिन वह केवल 19 जीत सकी, और बाद में उसे खराब प्रदर्शन के लिए आलोचना झेलनी पड़ी।
RJD ने हाल के वर्षों में अपनी रणनीति में बदलाव किया है। पार्टी ने मुस्लिम-यादव (MY) आधार से बाहर निकलकर गैर-यादव ओबीसी और कुशवाहा समुदायों को आकर्षित करने की कोशिश की है। 2024 के लोकसभा चुनाव में RJD ने औरंगाबाद सीट जीतकर नीतीश के लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) गठजोड़ को तोड़ा था, और अब यह रणनीति विधानसभा चुनाव में भी कारगर दिख रही है।
#### मतदाताओं का मूड: बदलाव की चाहत
सर्वे में यह भी सामने आया कि बिहार के मतदाता बदलाव की मांग कर रहे हैं। 50% लोगों ने कहा कि वे मौजूदा सरकार से नाराज हैं और बदलाव चाहते हैं, जबकि 22% नाराज हैं लेकिन बदलाव नहीं चाहते। 25% लोगों ने कहा कि वे न तो नाराज हैं और न ही बदलाव चाहते हैं। यह आंकड़ा नीतीश सरकार के लिए खतरे की घंटी है, क्योंकि यह साफ है कि जनता में असंतोष बढ़ रहा है।
सर्वे में केंद्र की मोदी सरकार के प्रदर्शन को लेकर भी सवाल पूछे गए। 56% लोगों ने कहा कि वे मोदी सरकार से बहुत संतुष्ट हैं, 12% ने कहा कि वे कुछ हद तक संतुष्ट हैं, जबकि 30% असंतुष्ट हैं। यह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बिहार में अभी भी मजबूत है, जो NDA के लिए एक सकारात्मक पहलू है।
#### बिहार की सियासत में अहम मुद्दे
बिहार में इस बार के चुनाव में कई मुद्दे अहम रहेंगे। बेरोजगारी, बाढ़ प्रबंधन, और कोविड-19 के दौरान प्रवासियों की समस्याओं ने नीतीश सरकार की आलोचना को बढ़ाया है। दूसरी ओर, तेजस्वी यादव ने रोजगार सृजन और सामाजिक न्याय पर जोर देकर युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश की है।
NDA अपनी ओर से विकास के मुद्दों को आगे रख रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2025 के बजट में बिहार के लिए कई परियोजनाओं की घोषणा की, जिसमें मखाना बोर्ड की स्थापना, एक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, और पश्चिमी कोशी नहर परियोजना के लिए वित्तीय सहायता शामिल है। इसके अलावा, IIT पटना के विस्तार और बिहार में राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी, उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान की स्थापना की योजनाएं भी मतदाताओं को लुभाने की कोशिश हैं।
#### विपक्ष की रणनीति: तेजस्वी का MY-BAAP फॉर्मूला
RJD ने 2024 में MY-BAAP (मुस्लिम, यादव, बहुजन, अगड़ा, आधी आबादी, और गरीब) फॉर्मूले को अपनाया था, जो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) मॉडल से प्रेरित था। हालांकि, लोकसभा चुनाव में इस रणनीति का मिश्रित प्रभाव देखने को मिला, लेकिन विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन को मजबूत करने में मदद कर सकता है। RJD ने हाल ही में NDA से अलग हुए पशुपति कुमार पारस को अपने पक्ष में लाकर पासवान समुदाय को आकर्षित करने की कोशिश की है।
#### NDA की एकजुटता: एक बड़ा सवाल
NDA ने 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में 225 सीटें जीतने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। गठबंधन ने नीतीश कुमार के नेतृत्व में एकजुटता दिखाने की कोशिश की है, और हर जिले में संयुक्त बैठकें आयोजित की जा रही हैं। JDU के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन ने कहा, “दिल्ली की जीत ने NDA की एकजुटता का संदेश दिया है। हम 225 सीटें जीतने की राह पर हैं।”
हालांकि, गठबंधन के भीतर तनाव साफ दिखाई दे रहा है। BJP के कुछ नेताओं का मानना है कि नीतीश की घटती लोकप्रियता गठबंधन के लिए नुकसानदेह हो सकती है। सर्वे में सम्राट चौधरी को 8% और चिराग पासवान को 4% लोगों ने मुख्यमंत्री के रूप में पसंद किया, जो नीतीश के लिए एक चेतावनी है।
#### बिहार की जनता का मूड: कौन पास, कौन फेल?
इस सर्वे के आधार पर तेजस्वी यादव और RJD को पास माना जा सकता है, क्योंकि उन्होंने मतदाताओं का विश्वास जीतने में सफलता हासिल की है। दूसरी ओर, नीतीश कुमार और JDU को फेल माना जा सकता है, क्योंकि उनकी लोकप्रियता और विश्वसनीयता में भारी गिरावट आई है। प्रशांत किशोर का उभरना एक आश्चर्यजनक पहलू है, जो भविष्य में बिहार की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।
#### भविष्य की राह: अनिश्चितता और संभावनाएं
7 मई 2025 की सुबह 8:15 बजे तक, बिहार की सियासत में हलचल मची हुई है। यह सर्वे दर्शाता है कि NDA को अभी भी वोट शेयर में बढ़त है, लेकिन उसकी राह आसान नहीं है। तेजस्वी यादव और महागठबंधन ने एक मजबूत चुनौती पेश की है, और प्रशांत किशोर का उभरता प्रभाव सियासी समीकरणों को बदल सकता है।
बिहार के मतदाता इस बार बदलाव के मूड में दिख रहे हैं, और यह देखना दिलचस्प होगा कि अक्टूबर-नवंबर 2025 में होने वाले चुनावों में यह मूड वास्तविक परिणामों में कैसे बदलता है। फिलहाल, यह साफ है कि बिहार की जनता ने बड़ा खेल खेला है, और सियासी दलों को अपनी रणनीतियों पर फिर से विचार करना होगा।







