डोनाल्ड ट्रंप की एक बड़ी योजना: 10 लाख फिलिस्तीनियों को लीबिया में बसाने की तैयारी?
हाल ही में एक बेहद चौंकाने वाली और विवादास्पद खबर सामने आई है, जिसमें कहा जा रहा है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एक बड़ी योजना बनाई जा रही है। इस योजना के अंतर्गत लगभग 10 लाख फिलिस्तीनी नागरिकों को स्थायी रूप से लीबिया में बसाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। यह खबर न सिर्फ फिलिस्तीनी लोगों के लिए, बल्कि पूरी अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
इस खबर ने पूरी दुनिया में एक नई बहस छेड़ दी है। फिलि
स्तीनियों को उनका वतन छोड़कर एक ऐसे देश में बसाने की बात हो रही है, जो खुद वर्षों से संघर्ष, अस्थिरता और राजनीतिक उथल-पुथल का शिकार रहा है। इस कदम को लेकर कई सवाल उठते हैं—क्या यह मानवीय दृष्टिकोण से उचित है? क्या यह वास्तव में मध्य पूर्व में शांति ला सकता है? या फिर इसके पीछे कोई छिपा हुआ राजनीतिक एजेंडा है?
ट्रंप की भूमिका क्या है?
डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल कई बड़े और अप्रत्याशित फैसलों से भरा रहा है। उनके कार्यकाल में अमेरिका की विदेश नीति ने कई बार पारंपरिक रास्तों से हटकर काम किया। फिलिस्तीन और इजराइल के मुद्दे पर भी ट्रंप की नीतियाँ विवादों में रही हैं। अब जब उनके बारे में यह खबर सामने आई है कि वे फिलिस्तीनी शरणार्थियों को लीबिया में बसाने की योजना बना रहे हैं, तो इसे भी उनकी ‘आउट-ऑफ-द-बॉक्स’ रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
लीबिया क्यों?
इस योजना में सबसे बड़ा सवाल है—”लीबिया ही क्यों?”
लीबिया एक ऐसा देश है जो गद्दाफी की मौत के बाद लगातार संघर्षों और गृहयुद्धों से जूझ रहा है। वहां की राजनीतिक स्थिति अभी भी अस्थिर है और बुनियादी ढांचे की भारी कमी है। ऐसे में क्या यह देश 10 लाख नए लोगों को बसाने की स्थिति में है?
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा लीबिया को आर्थिक सहायता देने और उसे स्थायित्व की ओर ले जाने की कोशिश भी हो सकता है। वहीं, कुछ का मानना है कि यह सिर्फ फिलिस्तीनी मुद्दे को ‘बाईपास’ करने की एक राजनीतिक चाल है, ताकि इजराइल को और खुली छूट मिल सके।
फिलिस्तीनी नागरिकों की स्थिति
फिलिस्तीन के लोग दशकों से अपने वतन से बेघर हैं। इजराइल और फिलिस्तीन के बीच चले आ रहे संघर्षों ने लाखों लोगों को शरणार्थी बना दिया है। इन लोगों ने कई देशों में अस्थायी जीवन बिताया है—जॉर्डन, लेबनान, सीरिया और अन्य अरब देशों में। अब इन्हें स्थायी रूप से लीबिया भेजने की बात करना, एक बहुत बड़ा फैसला है जो उनके जीवन को पूरी तरह बदल देगा।
फिलिस्तीनी नेतृत्व और आम नागरिकों की राय इस योजना को लेकर मिली-जुली है। कुछ लोग इसे अवसर के रूप में देख रहे हैं—कम से कम उन्हें एक स्थायी जगह तो मिलेगी। लेकिन अधिकतर लोग इसे एक धोखा मानते हैं—जिसमें उनके मूल अधिकार, उनकी पहचान और उनका देश उनसे छीन लिया जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
इस योजना को लेकर अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स और कुछ कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, इस पर गंभीर बातचीत हो रही है। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, अरब लीग और अन्य मानवाधिकार संगठनों ने इस विषय पर चिंता जाहिर की है।
उनका मानना है कि जब तक लीबिया खुद स्थिर नहीं होता, तब तक इस तरह की बड़ी आबादी को वहां बसाना न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि यह वहां की मौजूदा स्थिति को और खराब कर सकता है। इसके अलावा, फिलिस्तीनी लोगों की मर्जी के बिना उन्हें वहां भेजना, मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन भी हो सकता है।
संभावित नतीजे
अगर यह योजना लागू होती है, तो इसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं:
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मध्य पूर्व की भौगोलिक राजनीति में बड़ा बदलाव।
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फिलिस्तीन का पारंपरिक संघर्ष कमजोर हो सकता है।
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लीबिया की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति पर असर पड़ेगा।
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इस्राइल को एक तरह से अप्रत्यक्ष जीत मिल सकती है।








