ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान में क्यों छा गए असदुद्दीन ओवैसी?
भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों की डोर जितनी संवेदनशील है, उतनी ही भावनात्मक भी। इन दोनों देशों की राजनीति, धर्म और सुरक्षा नीतियों का असर न केवल घरेलू माहौल पर पड़ता है, बल्कि पड़ोसी देशों में भी हलचल पैदा करता है। हाल ही में भारतीय सेना द्वारा किए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद, एक ऐसा नाम अचानक पाकिस्तान में ट्रेंड करने लगा, जिसकी चर्चा आमतौर पर भारत की आंतरिक राजनीति तक सीमित रहती है — असदुद्दीन ओवैसी।
लेकिन सवा

ल उठता है कि आखिर पाकिस्तान में ओवैसी अचानक चर्चा का विषय क्यों बन गए? वह कौन सी बात थी जिसने पाकिस्तान की मीडिया और सोशल मीडिया को ओवैसी के भाषणों, ट्वीट्स और विचारों की ओर मोड़ दिया?
आईए वि
स्तार से समझते हैं पूरा घटनाक्रम:
ऑपरेशन सिंदूर: क्या है ये सैन्य कार्रवाई?
‘ऑपरेशन सिंदूर’ भा
रतीय सेना द्वारा हाल ही में किया गया एक गुप्त सैन्य अभियान था, जिसमें सीमा पार आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। इस ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य भारत में आतंकी घुसपैठ को रोकना और नियंत्रण रेखा (LoC) पर भारतीय सेना के शौर्य का प्रदर्शन करना था। यह मिशन सफल रहा और कई आतंकियों को ढेर किया गया। इस ऑपरेशन को “सिंदूर” नाम इसलिए दिया गया क्योंकि यह प्रतीक है भारतीय महिलाओं के सम्मान और राष्ट्र की अस्मिता का।
इस ऑपरेशन के तुरंत बाद पाकिस्तान के कुछ प्रमुख मीडिया हाउस और पत्रकारों ने इसे भारत की आक्रामक सैन्य नीति के रूप में देखा और कई आलोचनाएं भी कीं। इसी संदर्भ में, उन्होंने भारत के भीतर मौजूद कुछ नेताओं की प्रतिक्रियाओं की तलाश शुरू की।
यहां एंट्री होती है असदुद्दीन ओवैसी की।
क्यों ट्रेंड करने लगे ओवैसी?
AIMIM प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी को उनके स्पष्टवादी राजनीतिक दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है। चाहे वह मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना हो, मुस्लिम समुदाय के अधिकारों की बात हो या फिर भारत-पाक मुद्दों पर राय — ओवैसी हमेशा स्पष्ट और विवादास्पद बयान देते आए हैं।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब ओवैसी ने संसद या किसी सभा में इस कार्रवाई पर कोई टिप्पणी की, तो पाकिस्तानी मीडिया ने इसे हाथों-हाथ लपक लिया। उन्होंने ओवैसी के भाषण की कुछ पंक्तियों को हेडलाइन बना दिया, जैसे:
“भारत में भी ऐसे नेता हैं जो मुसलमानों की आवाज़ उठाते हैं…”
पाकिस्तानी चैनलों और यूट्यूब पर ओवैसी के भाषणों के क्लिप्स वायरल होने लगे। वहां के पत्रकारों ने यहां तक कह डाला कि “भारत का यह नेता पाकिस्तान में सुना जा रहा है क्योंकि वह सच बोलता है।”
पाकिस्तान की मीडिया का नजरिया
पाकिस्तानी मीडिया में ओवैसी को दो तरह से देखा जा रहा है:
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एक तरफ कुछ पत्रकार और विचारक उन्हें भारत में मुसलमानों की आवाज़ के रूप में पेश कर रहे हैं, जो “हिंदुत्ववादी नीतियों” के खिलाफ खुलक
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र बोलते हैं।
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वहीं कुछ राष्ट्रवादी मीडिया हाउस उन्हें “भारत विरोधी ताकतों के सहायक” के रूप में दिखा रहे हैं, जिससे उनकी वैधता और मंशा पर सवाल खड़े किए जा सकें।
यह दोहरा रवैया पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति को दर्शाता है, जहां भारत में मुस्लिम नेताओं को लेकर एक अजीब सी दिलचस्पी और असहजता दोनों मौजूद हैं।
ओवैसी की प्रतिक्रिया
अब तक ओवैसी ने खुद पाकिस्तानी मीडिया में अपनी चर्चा पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन उनके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर इसे ‘भारतीय लोकतंत्र की ताकत’ और ‘विचारों की स्वतंत्रता’ से जोड़ा है।
AIMIM पार्टी के कुछ स्थानीय नेताओं ने यह जरूर कहा कि “हम न तो पाकिस्तान के लिए बोलते हैं, न ही उसकी राजनीति में हस्तक्षेप करते हैं। पाकिस्तान की मीडिया हमारी आंतरिक बातों को तोड़-मरोड़ कर दिखा रही है।”
भारत में राजनीतिक प्रतिक्रिया
ओवैसी के पाकिस्तान में ट्रेंड करने की खबरों पर भारतीय राजनीति में भी हलचल देखी गई। कुछ भाजपा नेताओं ने तंज कसते हुए कहा:
“ओवैसी की लोकप्रियता अब भारत में कम और पाकिस्तान में ज़्यादा हो गई है।”
वहीं विपक्षी नेताओं ने इसका समर्थन या विरोध करने से बचते हुए इसे “मीडिया हाइप” करार दिया।
क्या यह किसी रणनीति का हिस्सा है?
राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो पाकिस्तान की मीडिया में भारतीय नेताओं की टिप्पणियों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करना एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। इससे पाकिस्तान अपने लोगों को यह दिखाना चाहता है कि “भारत में भी सरकार के खिलाफ आवाज़ें हैं”, जो उसकी छवि को मजबूत करती है।
लेकिन क्या ओवैसी सच में पाकिस्तान की राजनीति में कोई भूमिका निभा सकते हैं? शायद नहीं। वह एक भारतीय सांसद हैं और भारत की संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर काम करते हैं।
हालांकि, यह घटना भारतीय राजनीति को जरूर सोचने पर मजबूर करती है कि किसी भी बयान का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव कैसे हो सकता है।







