गाजा पट्टी में नरसंहार की आशंका: क्या 14,000 बच्चों की जान बचाना अब भी संभव है?
विश्व के सबसे संवेदनशील और जटिल संघर्षों में से एक — इजराइल और फिलिस्तीन का विवाद — एक बार फिर ऐसा मोड़ ले चुका है जहाँ मानवता की आत्मा तक झकझोर दी गई है। खबरें आ रही हैं कि आने वाले दो दिनों में गाजा पट्टी में लगभग 14,000 बच्चों की मौत हो सकती है यदि मौजूदा हालात नहीं बदले। यह न केवल एक मानवीय त्रासदी है, बल्कि वैश्विक न्याय प्रणाली, संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की असफलता का भी जीवंत
उदाहरण है।
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गाजा में मौजूदा स्थिति: एक मानवीय संकट
गाजा पट्टी, जो पहले से ही एक घनी
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आबादी वाला और सीमित संसाधनों से जूझता क्षेत्र है, पिछले कुछ महीनों से लगातार हमलों और प्रतिबंधों के कारण एक खुले कारागार में तब्दील हो चुका है। अस्पतालों में दवाएं खत्म हो चुकी हैं, बिजली की आपूर्ति ठप है, और बच्चों के लिए न पीने का पानी है, न खाना।
UNICEF और अन्य मानवीय संस्थाओं ने आगाह किया है कि यदि फौरन राहत नहीं पहुंचाई गई, तो गाजा में करीब 14,000 बच्चे अगले 48 घंटों में भूख, बीमारी और बमबारी से मर सकते हैं।
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संयुक्त राष्ट्र (UN) की भूमिका: कागज़ी कार्रवाई तक सीमित?
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना ही इसी
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सिद्धांत पर हुई थी — विश्व में शांति और सुरक्षा की रक्षा करना। लेकिन गाजा में हो रही त्रासदी पर संयुक्त राष्ट्र की कार्रवाई अत्यंत सीमित, धीमी और कई बार राजनीतिक प्रभाव में जकड़ी हुई प्रतीत होती है।
संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली में प्रस्ताव पारित किए जाते हैं, लेकिन सुरक्षा परिषद में वीटो की राजनीति हर बार न्याय को रोक देती है। जब दुनिया के सबसे ताकतवर देश किसी एक पक्ष के समर्थन में खड़े हो जाते हैं, तब इंसाफ की आवाजें दबा दी जाती हैं।
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अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की निष्क्रियता: न्याय की हार?
ICJ, जो अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान करने वाली सर्वोच्च न्यायिक संस्था है, अब तक गाजा की स्थिति को लेकर कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं कर पाया है। 2024 में दक्षिण अफ्रीका द्वारा लाया गया केस — जिसमें इजराइल पर ‘जनसंहार’ के आ
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रोप लगाए गए — अब तक धीमी सुनवाई और प्रक्रियात्मक जटिलताओं में अटका है।
इस बीच, हर दिन सैकड़ों बच्चे अपनी जान गंवा रहे हैं। क्या न्याय सिर्फ दस्तावेज़ों में सीमित होकर रह गया है?
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14,000 बच्चों की मौत: आंकड़ा या चेतावनी?
इस संख्या को केवल एक आंकड़ा मानना मानवता के खिलाफ अपराध जैसा होगा। हर बच्चा एक जीवन है — एक सपना, एक परिवार की उम्मीद। जब हम कहते हैं कि 14,000 बच्चे मारे जा सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि 14,000 घर हमेशा के लिए उजड़ जाएंगे, हजारों मांओं की कोख सूनी हो जाएगी।
इन बच्चों की कोई गलती नहीं थी। उन्होंने न तो युद्ध शुरू किया, न ही राजनीति समझी। वे सिर्फ जीना चाहते थे।
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मीडिया की भूमिका: संतुलन
या भ्रामकता?
मीडिया को “चौथा स्तंभ” कहा जाता है, लेकिन गाजा के मामले में वह भी कई बार पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग या सीमित कवरेज का दोषी पाया गया है। कुछ मीडिया हाउस युद्ध को केवल राजनीतिक चश्मे से दिखाते हैं, जबकि बच्चों की मौत, अस्पतालों पर हमले और मानवीय संकट की खबरें हाशिये पर डाल दी जाती हैं।
यदि मीडिया निष्पक्ष और मानवतावादी नहीं होगा, तो आम जनता तक सच्चाई कैसे पहुंचेगी?
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अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी: नैतिक जिम्मेदारी का प्रश्न
दुनिया भर की सरकारें, विशेषकर पश्चि
मी देश, इस संकट पर या तो चुप हैं या कूटनीतिक भाषा में “संतुलन” बनाने की कोशिश कर रही हैं। सवाल यह है: जब बात 14,000 मासूम जानों की हो, तब भी क्या संतुलन संभव है?
मानवाधिकार केवल शब्द नहीं, व्यवहार में उतारने के लिए होते हैं। जो देश खुद को मानवाधिकारों का रक्षक मानते हैं, उनकी निष्क्रियता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
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समाधान की संभावना: क्या अब भी कुछ हो सकता है?
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तत्काल युद्धविराम (Ceasefire) : यह पहला कदम होना चाहिए।
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मानवीय गलियारे (Humanit
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arian Corridors) : ताकि भोजन, दवाएं और चिकित्सकीय सहायता प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंच सके।
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स्वतंत्र जांच (Independent Investigation) : ताकि सभी पक्षों की जिम्मेदारी तय की जा सके।
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वैश्विक दबाव : नागरिक समाज, NGOs और आम जनता को मिलकर अपनी सरकारों पर दबाव डालना चाहिए।
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भारत का दृष्टिकोण और भूमिका
भारत, जो वर्षों से खुद को वैश्विक दक्षिण की आवाज़ कहता आया है, उसे इस मानवीय संकट पर एक संतुलित लेकिन स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। भारत का अनुभव, कूटनीति और ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन के साथ सहानुभूति उसे मध्यस्थता की भूमिका में ला सकती है।








