5 साल में बदले कोरोना के वैरिएंट, क्या बदली वैक्सीन? जानिए Yale University की रिसर्च क्या कहती है
साल 2020 में जब दुनिया ने पहली बार COVID-19 का सामना किया, तब किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह वायरस मानव जीवन और विज्ञान दोनों को इस हद तक बदल देगा। तब से अब तक, पाँच साल बीत चुके हैं और कोरोना वायरस ने कई बार अपना रूप बदला है — कभी डेल्टा, कभी ओमिक्रॉन और अब इसके नए सब-वैरिएंट्स।
लेकिन सवाल ये है: जब
वायरस बदला है, तो क्या वैक्सीन भी बदली है? और अगर बदली है, तो कितनी और कैसे? Yale University की हालिया रिसर्च इस विषय पर बेहद महत्वपूर्ण जानकारी देती है।
1. कोरोना वायरस के वैरिएंट का बदलता चेहरा
COVID-19 वायरस की सबसे खास बात इसकी “म्यूटेशन क्षमता” है। यह वायरस बार-बार अपना जीनोमिक कोड बदलता है ताकि वह शरीर की इम्यून सिस्टम से बच सके।
2020 से अब तक प्रमुख वैरिएंट्स में शामिल रहे हैं:
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Alpha (B.1.1.7)
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Delta (B.1.617.2)
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Omicron (B.1.1.529)
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और अब कई Omicron Subvariants
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(XBB, BA.2.86, JN.1)
हर नए वैरिएंट ने पहले की तुलना में अधिक संक्रामक होने की कोशिश की और कई बार टीकों की प्रभावशीलता को चुनौती दी।
2. क्या वैक्सीन भी बदली है?
Yale University के वैज्ञानिकों के अनुसार, हां — वैक्सीन तकनीक और उनके फॉर्मूलेशन में लगातार बदलाव किए गए हैं।
a) mRNA वैक्सीन की बात करें तो:
फाइज़र और मॉडर्ना ने 2020 में जो मूल mRNA वैक्सीन तैयार की थी, वह मूल “Wuhan strain” के लिए थी। लेकिन जैसे-जैसे नए वैरिएंट्स आए, टीकों को अपडेट किया गया:
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2021 में डेल्टा वैरिएंट के प्रभाव को देखते हुए बूस्टर डोज़ की शुरुआत हुई
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2022-23 में ओमिक्रॉन-विशिष्ट बायवैलेंट बूस्टर विकसित किए गए
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2024 में सामने आए XBB वैरिएंट्स को ध्यान में रखते हुए नई mRNA वैक्सीन को अप्रूवल मिला
Yale की रिपोर्ट कहती है कि ये नए वैक्सीन फॉर्मूलेशन न केवल वैरिएंट्स के खिलाफ सुरक्षा देते हैं, बल्कि “इम्यून मेमोरी” को भी बढ़ाते हैं।
3. Yale University की रिसर्च में क्या ख़ास है?
Yale University ने 2024 के अंत में एक विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया जिसमें करीब 10,000 लोगों के वैक्सीन रिस्पॉन्स और COVID संक्रमण का डेटा शामिल था।
प्रमुख निष्कर्ष:
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वैक्सीन रिस्पॉन्स हर वैरिएंट के साथ थोड़ा कमजोर होता गया, लेकिन बूस्टर डोज़ इस अंतर को भर देते हैं
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mRNA वैक्सीन में बदलाव करने से 60-7
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5% तक इम्यून रेस्पॉन्स बेहतर हुआ
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पहले संक्रमित या वैक्सीनेटेड लोगों में हाइब्रिड इम्युनिटी पाई गई, जो वैरिएंट्स के खिलाफ अधिक प्रभावी रही
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5 साल बाद भी टीके गंभीर बीमारी से बचाव में प्रभावशाली रहे
4. क्या हर किसी को नए वैक्सीन की ज़रूरत है?
Yale के वैज्ञानिकों का मानना है कि हर किसी को नहीं, लेकिन विशेष समूहों को अवश्य चाहिए:
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60 वर्ष से ऊपर के लोग
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पहले से बीमारियां झेल रहे व्यक्ति
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स्वास्थ्यकर्मी
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कमजोर इम्युनिटी वाले लोग
इन समूहों के लिए हर साल अपडेटेड बूस्टर डोज़ लेना फायदेमंद साबित हो सकता है — बिलकुल फ्लू वैक्सीन की तरह।
5. भारत और दुनिया में वैक्सीन नीति में बदलाव
भारत में भी अब नई पीढ़ी की mRNA वैक्सीन और “नेजल वैक्सीन” पर ध्यान दिया जा रहा है। सरकारी और निजी स्तर पर ओमिक्रॉन के वैरिएंट्स के अनुरूप टीकों के ट्रायल किए जा रहे हैं।
WHO और CDC भी इस बात को स्वीकार चुके हैं कि कोरोना एक एंडेमिक बीमारी बनती जा रही है, और इसका टीकाकरण सालाना रूटीन बन सकता है।
6. भविष्य क्या कहता है?
Yale और अन्य वैज्ञानिक संस्थाओं की राय में हमें COVID वैक्सीन को समय के अनुसार अपडेट करते रहना होगा — जैसे कंप्यूटर को एंटीवायरस अपडेट मिलता है।
भविष्य में हो सकता है कि:
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मल्टी-वैलेंट वैक्सीन (जो कई वैरिएंट्स को कवर करें) प्रचलन में आए
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नेजल स्प्रे या ओरल वैक्सीन ज्यादा आम हो जाए
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सालाना COVID टीकाकरण स्कूलों और ऑफिसों में नियमित प्रक्रिया बन जाए







