भारत में साइबर अपराधों और फर्जीवाड़ों की दुनिया में अगर जामताड़ा का नाम सबसे पहले लिया जाता है, तो अब एक और जगह खतरनाक तरीके से सामने आ रही है — उत्तर प्रदेश का संभल ज़िला। यहां एक ऐसा संगठित गैंग सक्रिय है, जिसने न केवल फर्जी दस्तावेज़ बनाकर बीमा क्लेम की ठगी को अंजाम दिया है, बल्कि इलाज और मौत जैसी संवेदनशील बातों को भी मुनाफे के धंधे में बदल डाला है।
यह गैंग असली

अस्पतालों, फर्जी मरीजों, झूठे इलाज के कागज़ात, नकली मृत्यु प्रमाणपत्र और बीमा कंपनियों की खामियों का फायदा उठाकर करोड़ों रुपये का बीमा क्लेम हासिल करता है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह काम मोबाइल कॉल्स या ऑनलाइन OTP से नहीं होता, बल्कि ज़मीनी स्तर पर बेहद शातिर तरीके से योजनाबद्ध ढंग से किया जाता है।
कैसे होता है यह खेल?
इस गैंग का कामकाज बेहद सुनियोजित होता है। पहले गरीब या अनपढ़ लोगों को निशाना बनाया जाता है, जिनके नाम पर बीमा पॉलिसी खरीदी जाती है। इसके बाद फर्जी इलाज के दस्तावेज़ बनाए जाते हैं और उन्हें ऐसे अस्पतालों में भर्ती दिखाया जाता है, जहां साठगांठ पहले से तय होती है। इलाज में गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर, हृदय रोग या गुर्दे फेल जैसी जानलेवा स्थितियां दर्शाई जाती हैं, ताकि क्लेम की राशि ज़्यादा से ज़्यादा हो।
इसके बाद मौत का खेल शुरू होता है। किसी मृत व्यक्ति का नाम, पहचान और कागज़ात लेकर फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र तैयार किया जाता है, और फिर बीमा क्लेम दायर किया जाता है। क्लेम मिलने के बाद, रकम का बड़ा हिस्सा गिरोह के सरगनाओं के पास जाता है, जबकि मामूली हिस्सा गरीब व्यक्ति या उसके परिजनों को दिया जाता है।
गैंग का नेटवर्क कितना बड़ा है?
संभल गैंग का नेटवर्क केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। इसमें बीमा एजेंट, डॉक्टर, अस्पताल कर्मचारी, डेटा ऑपरेटर और दस्तावेज़ तैयार करने वाले गिरोह तक शामिल हैं। जांच में यह भी सामने आया है कि इस गिरोह ने कई राज्यों में फर्जी बीमा पॉलिसियां चालू कर रखी थीं।
कुछ मामलों में एक ही व्यक्ति के नाम पर दो से तीन बीमा कंपनियों से क्लेम दायर किए गए हैं — वो भी अलग-अलग शहरों और अस्पतालों के दस्तावेज़ों के साथ।
कानूनी पकड़ में कैसे आया मामला?
बीमा कंपनियों ने जब बार-बार एक जैसे दस्तावेज़ों और पैटर्न को नोट किया, तब उन्होंने जांच एजेंसियों को सतर्क किया। जांच के दौरान पाया गया कि कई क्लेम फर्जी थे और उनके नाम पर जिन अस्पतालों का उल्लेख था, वे या तो बंद हो चुके थे या उनकी फाइलें गायब थीं।
इसके बाद जब गहराई से जांच की गई, तो संभल से एक पूरा नेटवर्क सामने आया, जहां से ये फर्जीवाड़ा संचालित हो रहा था। पुलिस और स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने मिलकर छापेमारी की और कई लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें डॉक्टर, एजेंट और डॉक्यूमेंट विशेषज्ञ शामिल थे।
क्या कहती है स्थानीय जनता और प्रशासन?
स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे गिरोह बहुत समय से सक्रिय हैं लेकिन पहले कभी इतने बड़े पैमाने पर सामने नहीं आए थे। यह गिरोह उन गरीब लोगों की मजबूरी का फायदा उठाता है, जिन्हें इलाज की ज़रूरत होती है या जो थोड़े पैसों के लालच में झूठे दस्तावेज़ों पर साइन कर देते हैं।
प्रशासन का कहना है कि जांच चल रही है और इसमें और भी बड़े नामों के जुड़ने की संभावना है। राज्य सरकार ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया है और केंद्रीय एजेंसियों को भी जांच में शामिल करने की तैयारी है।
इसका सामाजिक प्रभाव क्या है?
यह सिर्फ एक ठगी की कहानी नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक चिंता भी है। यह मामला दर्शाता है कि हमारे समाज में कैसे गरीबी, लाचारी और जागरूकता की कमी का फायदा उठाकर कुछ लोग मानवता से नीचे गिर जाते हैं। जहां इलाज और बीमा जैसी चीज़ें आम आदमी के लिए सुरक्षा का जरिया होनी चाहिए, वहीं इन्हें मौत और मुनाफे का औज़ार बना दिया गया है।
अब आगे क्या?
सरकार और बीमा कंपनियों को चाहिए कि वे डिजिटल वेरिफिकेशन सिस्टम को मजबूत करें, फील्ड ऑडिट को अनिवार्य बनाएं और मेडिकल दस्तावेज़ों की प्रमाणिकता सुनिश्चित करने के लिए बेहतर तकनीक अपनाएं।
इसके अलावा आम लोगों को भी जागरूक होना पड़ेगा, ताकि वे ऐसी फर्जी योजनाओं का हिस्सा न बनें और अपने अधिकारों की रक्षा कर सकें।







