वॉशिंगटन डीसी / इस्लामाबाद:
पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) के प्रमुख बिलावल भुट्टो ज़रदारी एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गए हैं। इस बार वजह बनी है उनका अमेरिकी दौरा, जहां उन्होंने प्रेस को संबोधित करते हुए सीधे तौर
पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर आरोप लगाया कि “अमेरिका की अफगान नीति और क्षेत्रीय हस्तक्षेप ने पाकिस्तान में आतंकवाद को हवा दी।”
यह बयान न केवल पाकिस्तान-अमेरिका संबंधों में तल्खी का इशारा करता
है, बल्कि दक्षिण एशिया की भूराजनीतिक स्थिति को भी नए दृष्टिकोण से देखने की ज़रूरत पैदा करता है।
बिलावल भुट्टो का बयान: क्या कहा उन्होंने?
बिलावल भुट्टो ने वॉशिंगटन में आयोजित एक थिंक टैंक के कार्यक्रम में कहा:
“अफगानिस्तान से अचानक अमेरिकी वापसी, ट्रंप प्रशासन की जल्दबाजी, और आतंक के खिलाफ बिना रणनीति के युद्ध ने पाकिस्तान को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया। सीमावर्ती क्षेत्रों में कट्टरपंथ को बढ़ावा मिला और पाकिस्तान को अपनी कीमत पर आतंकवाद से लड़ना पड़ा।”
उन्होंने यह भी कहा कि “सिर्फ पाकिस्तान पर आतंकवाद का ठप्पा लगाने से पहले यह देखना चाहिए कि अमेरिका ने अफगान क्षेत्र को अस्थिर कर वहां की आग हमारे घर तक पहुंचाई।”
आरोप के पीछे की पृष्ठभूमि: इतिहास क्या कहता है?
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अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों की शुरुआत 1950s में हुई, जब पाकिस्तान ने अमेरिका को सैन्य अड्डे दिए। बदले में उसे आर्थिक और सैन्य सहायता मिली।
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1979 के बाद, जब अफगानिस्तान में सोवियत संघ का दखल हुआ, तब अमेरिका ने पाकिस्तान के ज़रिए मुजाहिदीन को हथियार दिए।
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9/11 के बाद, अमेरिका ने आतंक के खिलाफ वैश्विक युद्ध छेड़ा, और पाकिस्तान को “आतंक के खिलाफ फ्रंटलाइन सहयोगी” घोषित किया गया।
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लेकिन 2018-19 में ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान की सैन्य सहायता रोक दी, यह कहते हुए कि वह आतंकवाद पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर रहा।
इसी पृष्ठभूमि में बिलाव
ल का बयान यह जताता है कि पाकिस्तान खुद को सिर्फ “विक्टिम” के तौर पर पेश करना चाहता है, जबकि अमेरिका उसे “डबल गेम” खेलने वाला देश मानता आया है।राजनीतिक विश्लेषण: बयान का क्या अर्थ निकाला जाए?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बिलावल भुट्टो का यह बयान:
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आंतरिक राजनीति में खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश है, खासकर सेना से समीकरण बनाने हेतु।
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अमेरिका के वर्तमान प्रशासन को यह संदेश देना भी है कि ट्रंप की नीतियों से नुकसान हुआ, ताकि बाइडन प्रशासन की सहानुभूति मिले।
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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को “आतंकवाद के शिकार” के रूप में पेश करने की रणनीति भी इसमें छिपी हो सकती है।
🇺🇸 अमेरिकी प्रतिक्रिया और डोनाल्ड ट्रंप का रुख
हालांकि ट्रंप की ओर से इस बयान पर सीधी प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन उनके करीबी रिपब्लिकन सांसदों और रणनीतिक सलाहकारों ने इसे “बेहद गैरजिम्मेदाराना” करार दिया है।
पूर्व अमेरिकी राजदूत रि
चर्ड ओल्सन ने कहा:
“पाकिस्तान हमेशा से डबल गेम खेलता रहा है। तालिबान को शरण देना और आतंक के खिलाफ लड़ाई में मदद करना — दोनों काम साथ करना अमेरिका को अब तक भारी पड़ा है।”
क्या पाकिस्तान आतंकवाद का शिकार है या स्रोत?
इस पर दो मत हैं:
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पाकिस्तानी पक्ष का दावा है कि वह 80,000 से ज्यादा नागरिक और सैनिक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में खो चुका है। आर्थिक नुकसान भी 100 अरब डॉलर से ज्यादा का हुआ है।
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दूसरी ओर भारत, अमेरिका, और अफगान सरकार का कहना है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियां अब भी आतंकवाद को समर्थन देती हैं।
दक्षिण एशिया में बढ़ता तनाव
बिलावल का यह बयान ऐसे समय में आया है जब:
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भारत-पाक सीमा पर फिर से गोलीबारी की घटनाएं बढ़ी हैं।
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अफगानिस्तान में तालिबान के साथ पाकिस्तान के रिश्तों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
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चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) पर अमेरिका खुलकर आलोचना कर चुका है।
ऐसे में बिलावल के आरोप सिर्फ ट्रंप के खिलाफ नहीं, बल्कि अमेरिका की पूरी रणनीति पर सवाल हैं।
जनता की राय और सोशल मीडिया पर हलचल
बिलावल के इस बयान के बाद पाकिस्तान में सोशल मीडिया दो खेमों में बंट गया है।
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कुछ लोग उनका समर्थन कर रहे हैं, यह कहकर कि “अमेरिका की नीतियों का खामियाज़ा पाकिस्तान ने भुगता है।”
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वहीं दूसरी ओर, कई बुद्धिजीवी और नागरिक यह भी कह रहे हैं कि “पाकिस्तान को अब आत्ममंथन करना चाहिए, हर बात का दोष दूसरों पर डालना अब पुराना बहाना हो गया है।”








