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संविधान सिर्फ एक दस्तावेज नहीं,

परिचय: संविधान – सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, एक चेतना

संविधान — जब हम यह शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में कानून की किताब, न्याय की परिभाषाएँ और नागरिक अधिकारों की एक लंबी सूची उभरती है। लेकिन क्या संविधान केवल कानूनों का संग्रह है?

हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधी

श (CJI) बी.आर. गवई ने इस धारणा को एक भावनात्मक और बौद्धिक दृष्टिकोण से चुनौती दी। उनके अनुसार, “संविधान स्याही से उकेरी गई परिवर्तनकारी शक्ति है। यह सिर्फ एक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक भावना, एक जीवन 

रेखा है।”

क्या है CJI गवई का संदेश?

CJI बी.आर. गवई का वक्तव्य महज़ एक औपचारिक भाषण नहीं था, बल्कि यह एक सजीव प्रेरणा थी जो हर नागरिक को संविधान की आत्मा से जोड़ने की कोशिश करती है।

उन्होंने कहा कि संविधान “शब्दों में नहीं, भावनाओं में लिखा गया है।” यह दस्तावेज भारत के हर कोने, हर जाति, धर्म, भाषा और संस्कृति को समान अधिकार और समान अवसर देने का वादा करता है।

वो आगे कहते हैं, “हमारे संविधान की आत्मा उस समय की संघर्षशील आवाजों की गूंज है, जिन्होंने आज़ादी के बाद सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता और समानता की नींव रखी।”

संविधान: एक क्रांतिकारी शुरुआत

1949 में जब संविधान को अंतिम रूप दिया ग

या था, तब यह केवल कानूनों की सूची नहीं थी, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का दस्तावेज था।

  • डॉ. भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में निर्मित यह संविधान उन असंख्य आवाज़ों का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें सदियों से दबाया गया था।

  • यह संविधान समाज के कमजोर वर्गों को समान मंच देने का माध्यम बना।

  • भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में यह एकता में अनेकता का असली प्रतीक है।

संविधान की भावना: कानून से परे एक चेतना

CJI गवई का यह कथन कि “संविधान एक जीवन रे

खा है” हमें सोचने पर मजबूर करता है कि इसका महत्व केवल अदालतों तक सीमित नहीं है।

संविधान:

  • बच्चों को शिक्षा का अधिकार देता है

  • गरीब को भोजन, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन का भरोसा देता है

  • महिलाओं को समानता और आत्मनिर्भरता का अवसर देता है

  • अल्पसंख्यकों को सुरक्षा और सम्मान की गारंटी देता है

यह दस्तावेज, हमारे रोजमर्रा के जीवन को आकार देने वाली संवेदनशील शक्ति है।

🏛️ न्यायपालिका और संविधान की रक्षा

CJI गवई का वक्तव्य यह भी स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका की सर्वोच्च जिम्मेदारी संविधान की भावना की रक्षा करना है।

आज जब कई संवैधानिक मूल्य राजनीतिक बहसों और मीडिया युद्धों में उलझते जा रहे हैं, तब एक जज का यह कहना कि संविधान “भावना है”, न्याय की गहराई और मानवीय दृष्टिकोण को उजागर करता है।

क्या हम संविधान को समझते हैं?

कई बार आम नागरिक संविधान को एक कठिन और तकनीकी ग्रंथ समझकर दूरी बना लेते हैं। जबकि, संविधान को समझना और जीना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।

  • संविधान हमें अधिकार देता है, लेकिन कर्तव्य भी याद दिलाता है

  • यह हमसे पूछता है: क्या हम न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों पर चल रहे हैं?

  • क्या हम संविधान को केवल वोट डालने के दिन ही याद करते हैं, या रोजमर्रा के जीवन में भी इसका पालन करते हैं?

CJI का संदेश युवाओं के लिए

CJI गवई का यह वक्तव्य विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए एक कॉल टू एक्शन है।

उन्होंने कहा कि संविधान एक ऐसा उपकरण है, जो सिर्फ सत्ता में बैठे लोगों के लिए नहीं बल्कि हर युवा के हाथ में बदलाव लाने की चाबी है।

उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे संविधान को पढ़ें, समझें और उसका इस्तेमाल सिर्फ अधिकार मांगने के लिए नहीं बल्कि समाज में संविधानिक चेतना फैलाने के लिए करें।

संविधान आज क्यों प्रासंगिक है?

  • आज जब समाज में ध्रुवीकरण और असहमति की आवाजें उभर रही हैं

  • जब समानता के अधिकार को चुनौती दी जा रही है

  • जब बोलने की आज़ादी पर सवाल खड़े हो रहे हैं
    …तब संविधान की मूल भावना को दोबारा समझने और लागू करने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।

 

 

 

 

 

 

 

 

Awaz Mazha
Author: Awaz Mazha

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