मुजफ्फरपुर में न्याय की रफ्तार धीमी: 300 दिन बीतने के बाद भी 5500 केस लंबित, DIG को सौंपी गई रिपोर्ट
बिहार के प्रमुख जिलों में शामिल मुजफ्फरपुर से एक चिंताजनक खबर सामने आई है, जहाँ पुलिस और प्रशासनिक प्रणाली की सुस्ती एक बार फिर उजागर हुई है। 300 से अधिक दिन बीतने के बाद भी जिले में 5500 से अधिक केस लंबित हैं, जिनमें से अधिकतर आपराधिक मामले हैं। यह आंकड़ा कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए जिले के
वरीय अधिकारियों ने एक विस्तृत रिपोर्ट DIG तिरहुत रेंज को सौंपी है। रिपोर्ट में केसों की स्थिति, अनुसंधान में देरी, स्टाफ की कमी, और तकनीकी अड़चनों को विस्तार से बताया गया है।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:
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5500+ लंबित केस जिनमें FIR दर्ज होने के बाद कार्रवाई ठप पड़ी है।
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इनमें से कई मामले IPC की गंभीर धाराओं के तहत हैं जैसे हत्या, लूट, बलात्कार और अपहरण।
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कई केस ऐसे हैं जिनमें चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है, जिससे न्याय की प्रक्रिया रुकी हुई है।
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कुछ केसों में जांच अधिकारी लंबे समय से ट्रांसफर हो चुके हैं, और नए अफसरों को केस हैंडओवर नहीं हुए।
क्यों हो रही है देरी?
रिपोर्ट में देरी के पीछे कई कारणों का उल्लेख किया गया है, जिनमें शामिल हैं:
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पुलिस बल की भारी कमी – एक पुलिसकर्मी पर औसतन 100 से अधिक केसों का बोझ है।
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तकनीकी संसाधनों की कमी – फोरेंसिक, साइबर सेल और डेटा एनालिसिस में देरी।
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प्रशासनिक उपेक्षा – समय पर मॉनिटरिंग न होना।
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केस डायरी और फाइलिंग में लापरवाही – दस्तावेजों की कमी से न्यायिक प्रक्रिया रुकी हुई है।
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कोर्ट और पुलिस के बीच समन्वय की कमी – जिससे कई मामलों में तारीख पर तारीख मिल रही है।
जनता पर क्या असर?
इतनी बड़ी संख्या में केसों का लंबित होना न केवल कानून व्यवस्था पर सवाल उठाता है, बल्कि पीड़ितों को भी मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से परेशान करता है।
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न्याय मिलने में देरी = न्याय से वंचित रहना
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पीड़ितों की सुरक्षा को खतरा बढ़ता है।
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अभियुक्त लंबे समय तक जमानत पर बाहर
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रहकर सबूतों को प्रभावित कर सकते हैं।
DIG को सौंपी गई रिपोर्ट में क्या है?
तिरहुत रेंज के DIG को सौंपे गए विस्तृत रिपोर्ट में:
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केसों की थाना-वार संख्या दी गई है।
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वर्गीकृत विवरण – गंभीर, मध्यम और सामान्य श्रेणियों में बंटवारा।
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जांच में देरी के कारणों की सूची।
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प्रत्येक केस की स्थिति रिपोर्ट, यानी किस स्टेज पर केस अटका हुआ है।
DIG ने रिपोर्ट मिलने के बाद सभी थानाध्यक्षों को निर्देश दिए हैं कि वे:
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प्राथमिकता के आधार पर लंबित केस निपटाएं।
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चार्जशीट समय पर दाखिल करें।
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हर सप्ताह केस प्रगति की समीक्षा करें।
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नागरिकों को केस स्टेटस की जानकारी दें।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
स्थानीय सामाजिक संगठनों और अधिवक्ता संघों ने इस स्थिति को गंभीर चिंता का विषय बताया है। उनका कहना है:
“जब तक आम नागरिक को समय पर न्याय नहीं मिलेगा, तब तक समाज में कानून का डर खत्म होता जाएगा।”
राजनीतिक हलकों में भी यह मुद्दा गरमा गया है, और विपक्षी दलों ने सरकार की कानून व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह “सुशासन नहीं, सुस्ती शासन” का उदाहरण है।
समाधान की दिशा में प्रयास
कुछ सुझाव जो रिपोर्ट में शामिल किए गए हैं:
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थानों में डिजिटल केस ट्रैकिंग सिस्टम को अनिवार्य बनाना।
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फास्ट ट्रैक जांच टीमें गठित करना।








