नागपुर, 7 मई 2025* – महाराष्ट्र में लंबे समय से लंबित स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मंगलवार, 6 मई 2025 को महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग (SEC) को चार सप्ताह के भीतर चुनाव की अधिसूचना जारी करने और चार महीने के भीतर पूरी प्रक्रिया समाप्त करने का सख्त निर्देश दिया। इस फैसले के बाद नागपुर सहित राज्य भर में प्रशासन हाई अलर्ट पर है, और चुनावी तैयारियां तेज कर दी गई हैं। यह कदम जमीनी स्तर प

र लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
#### लंबे समय से रुके चुनाव: पृष्ठभूमि
महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव पिछले तीन वर्षों से रुके हुए थे। इनमें नगर निगम, नगर परिषद, नगर पंचायत, जिला परिषद, पंचायत समिति और ग्राम पंचायत जैसे निकाय शामिल हैं। 2022 में इन निकायों का पांच साल का कार्यकाल समाप्त हो गया था, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण को लेकर कानूनी विवादों के कारण चुनाव नहीं हो सके। सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में 27% ओबीसी आरक्षण को रद्द कर दिया था, क्योंकि यह “ट्रिपल टेस्ट” मानदंडों को पूरा नहीं करता था।
“ट्रिपल टेस्ट” के तहत, ओबीसी आरक्षण के लिए तीन शर्तें जरूरी हैं: (1) समकालीन डेटा एकत्र करने के लिए एक समर्पित आयोग की स्थापना, (2) डेटा के आधार पर आरक्षण का अनुपात निर्धारित करना, और (3) कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए। जुलाई 2022 में बंठिया आयोग की रिपोर्ट के बाद भी विवाद बना रहा, जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2022 में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। इस बीच, इन निकायों का संचालन निर्वाचित प्रतिनिधियों के बजाय प्रशासकों द्वारा किया जा रहा था, जिससे जमीनी स्तर पर लोकतंत्र प्रभावित हो रहा था।
#### सुप्रीम कोर्ट का आदेश: चुनाव का रास्ता साफ
6 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस एनके सिंह शामिल थे, ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने कहा, “जमीनी स्तर पर लोकतंत्र का संवैधानिक जनादेश समय-समय पर चुनावों के माध्यम से सुनिश्चित किया जाना चाहिए। निर्वाचित निकायों का कार्यकाल निश्चित होता है, और इसमें देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती।”
कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग को चार सप्ताह के भीतर अधिसूचना जारी करने और चार महीने के भीतर चुनाव प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया। इसका मतलब है कि सितंबर 2025 तक चुनाव प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ओबीसी आरक्षण 2022 की बंठिया आयोग की रिपोर्ट से पहले जैसा था, वैसे ही लागू होगा। इस आदेश का मतलब है कि चुनाव बंठिया आयोग की सिफारिशों पर आधारित नहीं होंगे, बल्कि पुराने ढांचे के अनुसार होंगे।
#### ओबीसी आरक्षण का विवाद: कोर्ट का रुख
ओबीसी आरक्षण को लेकर कई याचिकाएं कोर्ट के समक्ष थीं। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि बंठिया आयोग ने “ट्रिपल टेस्ट” मानदंडों का पालन नहीं किया। उन्होंने कहा कि ओबीसी सूची में शामिल लोगों को बिना राजनीतिक पिछड़ेपन के अध्ययन के आरक्षण देना गलत है। उन्होंने संविधान पीठ के कृष्णमूर्ति निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर ओबीसी आरक्षण को राजनीतिक आरक्षण से अलग करना चाहिए।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बंठिया आयोग की रिपोर्ट से संबंधित चुनौतियों पर बाद में विचार किया जाएगा, लेकिन यह चुनावों को रोकने का आधार नहीं बन सकता। जस्टिस सूर्या कांत ने कहा, “चुनाव मौजूदा डेटा के आधार पर हो सकते हैं, और भविष्य में आरक्षण सूचियों में सुधार संभव है। इसमें किसी को अपूरणीय क्षति नहीं होगी।” कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनावों का परिणाम बंठिया आयोग की वैधता पर अंतिम फैसले के अधीन होगा।
#### प्रशासन पर प्रभाव: हाई अलर्ट की स्थिति
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद नागपुर सहित पूरे महाराष्ट्र में प्रशासन सक्रिय हो गया है। नागपुर नगर निगम (NMC) सहित राज्य के 2,486 स्थानीय निकायों में चुनाव होने हैं। इनमें बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC), पुणे, और नागपुर जैसे प्रमुख नगर निगम शामिल हैं। चुनाव आयोग को अब मतदाता सूचियों को अपडेट करने, प्रभागों की सीमांकन प्रक्रिया को अंतिम रूप देने और अन्य तैयारियां तेजी से पूरी करने की जिम्मेदारी है।
नागपुर में प्रशासन ने तुरंत बैठकें शुरू कर दीं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “हमें चार सप्ताह के भीतर अधिसूचना जारी करनी है, और इसके लिए हमें सभी तकनीकी और प्रशासनिक तैयारियां पूरी करनी होंगी।” राज्य सरकार ने भी चुनाव आयोग को हर संभव सहायता देने का आश्वासन दिया है। इस बीच, राजनीतिक दलों ने भी अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं, क्योंकि लंबे समय बाद स्थानीय स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधि चुनने का मौका मिलने जा रहा है।
#### चुनाव का दायरा: 2,486 निकाय प्रभावित
महाराष्ट्र में कुल 2,486 स्थानीय निकायों में चुनाव होने हैं। इनमें 29 नगर निगम, 26 जिला परिषद, 257 नगर परिषद, और 289 पंचायत समितियां शामिल हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रभागों की सीमांकन प्रक्रिया चुनावों को रोकने का आधार नहीं हो सकती। पहले राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि सीमांकन के कारण देरी हो रही है, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि यह एक सतत प्रक्रिया है और भविष्य के चुनावों के लिए लागू हो सकती है।
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-यू का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि स्थानीय निकायों के चुनाव हर पांच साल में होने चाहिए। कोर्ट ने राज्य सरकार और चुनाव आयोग की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को नजरअंदाज किया। जस्टिस सूर्या कांत ने टिप्पणी की, “प्रशासकों द्वारा शासन में जवाबदेही की कमी है, और अनुचित नीतिगत निर्णय लिए जा रहे हैं।”
#### राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: एकजुटता और उम्मीद
राज्य भर के राजनीतिक दलों ने इस फैसले का स्वागत किया है। उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने कहा, “यह फैसला लोकतंत्र को मजबूत करने वाला है। हम चुनाव आयोग को हर संभव सहायता देंगे।” कांग्रेस, शिव सेना (यूबीटी), और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) ने भी चुनावों का समर्थन किया, हालांकि ओबीसी आरक्षण को लेकर कुछ असहमति बनी हुई है।
नागपुर के पूर्व पार्षद संदीप सांगोले ने कहा, “चुनावों में देरी से जनता की समस्याएं बढ़ी हैं। NMC, NIT, और जिला प्रशासन के बीच समन्वय की कमी से विकास कार्य रुके हुए हैं। चुनावों से जवाबदेही और पारदर्शिता आएगी।” उन्होंने यह भी मांग की कि NIT को NMC में विलय कर दिया जाए ताकि प्रशासनिक प्रक्रिया सुगम हो सके।
#### ओबीसी आरक्षण: एक अनसुलझा सवाल
हालांकि कोर्ट ने चुनावों का रास्ता साफ कर दिया है, ओबीसी आरक्षण का मुद्दा अभी भी अनसुलझा है। बंठिया आयोग की सिफारिशों को लेकर कई याचिकाएं लंबित हैं, और कोर्ट ने कहा कि इस पर अंतिम फैसला बाद में होगा। इसका मतलब है कि अगर भविष्य में आयोग की सिफारिशें रद्द की जाती हैं, तो चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंग ने कोर्ट में तर्क दिया कि बंठिया आयोग की रिपोर्ट के आधार पर चुनाव नहीं होने चाहिए, क्योंकि इसने लगभग 34,000 ओबीसी सीटों को डी-रिजर्व कर दिया था। कोर्ट ने उनकी बात को स्वीकार करते हुए कहा कि पुराने आरक्षण ढांचे के आधार पर ही चुनाव होंगे।
#### भविष्य की राह: चुनौतियां और उम्मीदें
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने महाराष्ट्र में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को पुनर्जनन देने की उम्मीद जगाई है। हालांकि, चार महीने में इतने बड़े पैमाने पर चुनाव कराना एक बड़ी चुनौती है। चुनाव आयोग को मतदाता सूचियों को अपडेट करने, प्रभागों की व्यवस्था करने, और सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसे कई काम करने होंगे।
नागपुर जैसे शहरों में, जहां NMC का प्रशासन पिछले तीन साल से प्रशासक के हाथ में है, नागरिकों को उम्मीद है कि निर्वाचित प्रतिनिधि उनकी समस्याओं को बेहतर तरीके से हल करेंगे। एक स्थानीय निवासी ने कहा, “हमें अपने पार्षदों की जरूरत है, जो हमारी बात सुनें और समस्याओं का समाधान करें। प्रशासक केवल कागजी काम करते हैं।”
#### एक नई शुरुआत की ओर
7 मई 2025 की सुबह 8:12 बजे तक, राज्य भर में चुनावी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। यह फैसला न केवल महाराष्ट्र में लोकतंत्र को मजबूत करेगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगा कि नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकार मिलें। हालांकि, ओबीसी आरक्षण का मुद्दा भविष्य में नई कानूनी चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
यह समय राज्य सरकार, चुनाव आयोग, और राजनीतिक दलों के लिए एकजुट होकर काम करने का है, ताकि सितंबर 2025 तक चुनाव प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हो सके। महाराष्ट्र की जनता को अब अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद करने का मौका मिलेगा, जो लंबे समय से रुके लोकतंत्र को फिर से जीवंत करेगा।







