भारत में यौन हिंसा की समस्या एक गंभीर सामाजिक चुनौती है, और इसका सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि इसके शिकारों में बड़ी संख्या में बच्चे शामिल होते हैं। खासकर 18 साल से कम उम्र के बच्चे यौन उत्पीड़न और हिंसा के मामलों में असुरक्षित हैं। इन मासूमों के साथ हो रही अमानवीय घटनाएँ न केवल उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत पर गहरा असर डालती हैं, बल्कि समाज के नैतिक ताने-बाने को भी झकझोर कर रख देती हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड

ब्यूरो (NCRB) और अन्य शोधों से मिले आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल हजारों बच्चे यौन हिंसा के शिकार होते हैं। ‘पॉक्सो ऐक्ट’ (POCSO Act) के तहत दर्ज होने वाले मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो इस बात का संकेत है कि या तो अपराध बढ़ रहे हैं या रिपोर्टिंग में कुछ हद तक सुधार हुआ है। बावजूद इसके, विशेषज्ञों का मानना है कि बहुत से मामले आज भी सामने नहीं आ पाते, क्योंकि पीड़ित बच्चे डर, शर्म या सामाजिक दबाव के चलते अपनी बात कह ही नहीं पाते।
एक UNICEF रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग हर दो में से एक बच्चा कभी न कभी यौन शोषण का शिकार हुआ है। इनमें से अधिकतर मामलों में अपराधी पीड़ित के जान-पहचान के ही होते हैं—जैसे कि रिश्तेदार, शिक्षक, पड़ोसी या पारिवारिक मित्र। यह तथ्य स्थिति को और भी चिंताजनक बना देता है, क्योंकि बच्चे जिन पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं, वही उन्हें चोट पहुँचा रहे होते हैं।
इस समस्या की जड़ तक पहुँचने के लिए ज़रूरी है कि हम बच्चों के यौन अधिकारों को लेकर जागरूकता फैलाएं और उन्हें ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बीच का फर्क समझाएं। माता-पिता, शिक्षक और समाज को मिलकर बच्चों के लिए एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ वे अपनी बात खुलकर कह सकें और अगर कुछ गलत होता है तो डर के बिना मदद मांग सकें।
सरकार द्वारा बनाए गए कानून जैसे POSCO एक्ट और चाइल्डलाइन हेल्पलाइन (1098) जैसी पहलें सराहनीय हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर जागरूकता और सशक्तिकरण की बहुत ज़रूरत है। जब तक समाज के हर स्तर पर बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक इस चुनौती से पूरी तरह निपटना संभव नहीं होगा।
भारत में यौन हिंसा की समस्या एक गंभीर सामाजिक चुनौती है, और इसका सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि इसके शिकारों में बड़ी संख्या में बच्चे शामिल होते हैं। खासकर 18 साल से कम उम्र के बच्चे यौन उत्पीड़न और हिंसा के मामलों में असुरक्षित हैं। इन मासूमों के साथ हो रही अमानवीय घटनाएँ न केवल उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत पर गहरा असर डालती हैं, बल्कि समाज के नैतिक ताने-बाने को भी झकझोर कर रख देती हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और अन्य शोधों से मिले आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल हजारों बच्चे यौन हिंसा के शिकार होते हैं। ‘पॉक्सो ऐक्ट’ (POCSO Act) के तहत दर्ज होने वाले मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो इस बात का संकेत है कि या तो अपराध बढ़ रहे हैं या रिपोर्टिंग में कुछ हद तक सुधार हुआ है। बावजूद इसके, विशेषज्ञों का मानना है कि बहुत से मामले आज भी सामने नहीं आ पाते, क्योंकि पीड़ित बच्चे डर, शर्म या सामाजिक दबाव के चलते अपनी बात कह ही नहीं पाते।
एक UNICEF रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग हर दो में से एक बच्चा कभी न कभी यौन शोषण का शिकार हुआ है। इनमें से अधिकतर मामलों में अपराधी पीड़ित के जान-पहचान के ही होते हैं—जैसे कि रिश्तेदार, शिक्षक, पड़ोसी या पारिवारिक मित्र। यह तथ्य स्थिति को और भी चिंताजनक बना देता है, क्योंकि बच्चे जिन पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं, वही उन्हें चोट पहुँचा रहे होते हैं।
इस समस्या की जड़ तक पहुँचने के लिए ज़रूरी है कि हम बच्चों के यौन अधिकारों को लेकर जागरूकता फैलाएं और उन्हें ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बीच का फर्क समझाएं। माता-पिता, शिक्षक और समाज को मिलकर बच्चों के लिए एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ वे अपनी बात खुलकर कह सकें और अगर कुछ गलत होता है तो डर के बिना मदद मांग सकें।
सरकार द्वारा बनाए गए कानून जैसे POSCO एक्ट और चाइल्डलाइन हेल्पलाइन (1098) जैसी पहलें सराहनीय हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर जागरूकता और सशक्तिकरण की बहुत ज़रूरत है। जब तक समाज के हर स्तर पर बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक इस चुनौती से पूरी तरह निपटना संभव नहीं होगा।







