“वीरेंद्र सहवाग ने किया बड़ा खुलासा: उस कप्तान के सामने सचिन, सौरव और राहुल द्रविड़ भी चुप हो जाते थे!”
क्रिकेट की दुनिया में ऐसे कई किस्से होते हैं जो वर्षों बाद सामने आते हैं और फैंस के दिलों में एक खास जगह बना लेते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प खुलासा किया है टीम इंडिया के पूर्व विस्फोटक बल्लेबाज़ वीरेंद्र सहवाग ने, जिसमें उन्होंने उस कप्तान का नाम बताया, जिसकी डांट से सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और राहुल द्रविड़ जैसे दिग्गज खिलाड़ी भी जवाब नहीं देते थे।
सहवाग का खुलासा – एक सख्त लेकिन प्रेरणादायक कप्तान
एक पॉडकास्ट इंटरव्यू या टेलीविज़न शो के दौरान (जैसा कि आम तौर पर होता है), वीरेंद्र सहवाग से पूछा गया कि वह कौन सा कप्तान था जिसकी सबसे अधिक डांट लगती थी, और जिसके सामने बड़े-बड़े खिलाड़ी भी सहम जाते थे।
सहवाग मुस्कुराते हुए कहते हैं,
“वो थे अनिल कुंबले। जब वो कप्तान थे, तो सचिन, सौरव और द्रविड़ जैसे सीनियर खिलाड़ी भी उनकी बातों को बहुत गंभीरता से लेते थे और कभी पलटकर जवाब नहीं देते थे।”
अनिल कुंबले: कप्तानी का दूसरा चेहरा
अनिल कुंबले को भारतीय क्रिकेट का एक शांत और गंभीर चेहरा माना जाता रहा है। उनके चेहरे पर शायद ही कभी गुस्सा दिखाई देता हो, लेकिन सहवाग का यह बयान बताता है कि उनकी नेतृत्व शैली कितनी मजबूत और अनुशासित थी।
कुंबले का स्वभाव जितना शांत था, उतनी ही गहराई और दृढ़ता उनके फैसलों में थी। वे जब डांटते थे, तो सिर्फ इसलिए नहीं कि उन्हें गुस्सा आता था, बल्कि इसलिए कि वे टीम से श्रेष्ठ प्रदर्शन चाहते थे।
सहवाग के अनुसार: “अनुशासन में लिपटा प्रेरणा का रूप”
सहवाग कहते हैं:
“कुंबले भले ही सीनियर प्लेयर नहीं थे उस वक्त, लेकिन जब वे कप्तान बने, तो उन्होंने टीम को अनुशासन में रखा। कोई फर्क नहीं पड़ता था कि सामने सचिन हैं या सौरव, ड्रेसिंग रूम में अनुशासन सभी के लिए बराबर था।”
यह बात दर्शाती है कि एक सफल कप्तान वही होता है जो समानता से नेतृत्व करे। कुंबले ने अपने सीनियर खिलाड़ियों के साथ भी वही व्यवहार किया, जैसा एक नए खिलाड़ी के साथ किया जाता — यह नेतृत्व का उत्कृष्ट उदाहरण है।
जब दिग्गज भी हो जाएं शांत…
कई बार ऐसा होता है कि जब टीम में कई बड़े नाम होते हैं, तो अनुशासन बनाए रखना मुश्किल होता है। लेकिन सहवाग के मुताबिक,
“जब कुंबले कप्तान थे, तो कोई भी खिलाड़ी — चाहे वो सचिन हों, सौरव हों या राहुल — उनके डांटने पर चुपचाप सुनते थे और उसमें सुधार करने की कोशिश करते थे।”
यानी यह सिर्फ डर की बात नहीं थी, बल्कि सम्मान और विश्वास की भी थीड्रेसिंग रूम की झलक: लीडरशिप का असली चेहरा
क्रिकेट फील्ड पर जो होता है, वह कैमरे में कैद हो जाता है। लेकिन ड्रेसिंग रूम का माहौल किसी को नहीं पता होता — वहां की सच्ची कहानियां खिलाड़ी ही बता सकते हैं। सहवाग का यह खुलासा यह समझने में मदद करता है कि ड्रेसिंग रूम में कुंबले जैसे कप्तान कैसे खिलाड़ियों को गढ़ते हैं।
वो केवल रणनीति के मास्टर नहीं थे, बल्कि आत्मिक नेतृत्वकर्ता भी थे। वे खिलाड़ियों के दिल में इस तरह उतर जाते थे कि उनकी डांट भी एक सीख बन जाती थी।
कुंबले की कप्तानी के कुछ यादगार पल
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2007-08 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर कुंबले की कप्तानी में भारत ने संघर्ष करते हुए सीरीज ड्रॉ की थी, जिसमें उनका संयम और नेतृत्व देखने लायक था।
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कुंबले की कप्तानी में खिलाड़ियों को अपनी जिम्मेदारी खुद निभानी होती थी, और वह हमेशा टीम के लिए खड़े रहते थे।
नेतृत्व का असली मूल्य
कुंबले की यह शैली बताती है कि एक कप्तान सिर्फ रणनीति बनाने वाला नहीं होता, वह अपने व्यवहार से भी टीम को दिशा देता है। सहवाग की इस बात से यह भी साफ हो जाता है कि भले ही टीम में कितने भी बड़े खिलाड़ी हों, अगर नेतृत्वकर्ता मजबूत और न्यायसंगत हो, तो सब उसी की मानते हैं।







