सुप्रीम कोर्ट में ट्रंप प्रशासन की याचिका: लाखों कर्मचारियों की छंटनी पर लगी रोक हटाने की मांग से शुरू हुआ संवैधानिक संघर्ष
अमेरिकी प्रशासनिक व्यवस्था एक बार फिर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जिसमें उसने लाखों सरकारी कर्मचारियों की संभावित छंटनी पर लगी रोक को हटाने की गुहार लगाई है।
यह मामला केवल सरकारी नौकरियों की संख्या या बजट नियंत्रण का नहीं है—बल्कि यह अमेरिकी संविधान, कार्यपालिका की शक्ति, श्रमिक अधिकारों और न्यायपालिका के हस्तक्षेप के बीच संतुलन का सबसे जटिल उदाहरण बन गया है।
पृष्ठभूमि क्या है?
डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक पुनर्गठन और बजट कटौती की योजना के तहत कुछ सरकारी विभागों में बड़े पैमाने पर कर्मचारी छंटनी की बात उठी थी। यह प्रस्ताव संघीय कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग को प्रभावित कर सकता था, विशेषकर वे जो स्थायी नियुक्तियों पर कार्यरत हैं।
इन छंटनियों के खिलाफ सरकारी यूनियनों और कर्मचारियों ने अदालत का रुख किया था। निचली अदालतों ने इस पर अस्थायी रोक लगाते हुए कहा था कि यह कदम कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों और उचित प्रक्रिया के विरुद्ध हो सकता है।
अब ट्रंप प्रशासन की अपील क्या है?
पूर्व प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हुए कहा है कि—
“कार्यपालिका को यह अधिकार है कि वह किसे नियुक्त करे, किसे हटाए और किस बजटीय या नीति निर्णय के आधार पर कर्मचारियों की संख्या नियंत्रित करे। न्यायपालिका इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकती, क्योंकि यह नीति-निर्माण से जुड़ा मामला है।”
यह दलील न केवल कानूनी है, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से भी गंभीर महत्व रखती है। ट्रंप प्रशासन ने यह भी तर्क दिया है कि छंटनी की प्रक्रिया पूरी तरह से संवैधानिक थी और कार्यपालिका की स्वायत्तता का हिस्सा है।
संवैधानिक दायरे पर बहस
इस याचिका ने एक बार फिर यह सवाल उठा दिया है कि—
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क्या अमेरिका में कार्यपालिका को बिना न्यायिक समीक्षा के ऐसे फैसले लेने की पूरी आज़ादी है?
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क्या श्रमिक अधिकारों की रक्षा न्यायपालिका का दायित्व है?
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क्या प्रशासनिक नीतियाँ अदालत द्वारा नियंत्रित की जा सकती हैं?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से आने वाले वर्षों के लिए यह स्पष्ट हो सकता है कि सरकारी नीतियों और मानवाधिकारों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।
श्रमिक संगठनों की आपत्ति
अमेरिकन फेडरेशन ऑफ गवर्नमेंट एंप्लॉयीज़ (AFGE) और अन्य यूनियन संगठनों ने ट्रंप प्रशासन की याचिका को कर्मचारियों के अधिकारों पर हमला बताया है। उनके अनुसार—
“इस कदम से लाखों कर्मचारियों की नौकरी असुरक्षित हो जाएगी और कार्यस्थल की स्थिरता समाप्त हो सकती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे निर्णयों से लोकतांत्रिक जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता पर संकट आ सकता है।
आर्थिक तर्क बनाम मानवाधिकार
ट्रंप प्रशासन की दलील यह भी रही है कि छंटनी का निर्णय आर्थिक संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी था। बढ़ता बजट घाटा, कम कर राजस्व और वैश्विक मंदी का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि—
“सरकारी खर्चों में कटौती समय की मांग है, और इसके बिना संघीय ढांचे को बनाए रखना कठिन होगा।”
लेकिन आलोचकों का कहना है कि आर्थिक लाभ के नाम पर मानवाधिकारों और सुरक्षा की अनदेखी नहीं की जा सकती। विशेषकर जब बात लाखों लोगों की जीविका की हो।
सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने अब तक मामले पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है, लेकिन यह मामला संवैधानिक व्याख्या और सरकारी शक्तियों के सीमांकन के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यदि अदालत ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला देती है—
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तो कार्यपालिका को अधिक स्वायत्तता मिल सकती है।
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भविष्य में सरकारें अधिक छंटनी या नीति परिवर्तनों के लिए स्वतंत्र होंगी।
लेकिन यदि अदालत इस याचिका को खारिज करती है—
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तो कर्मचारियों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी।
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न्यायपालिका की भूमिका और मज़बूत होगी।







