1 करोड़ का इनामी, 150 जवानों का हत्यारा: कैसे 70 घंटे के ऑपरेशन में हुआ नक्सली बसवराजू का अंत
भारत में दशकों से जारी नक्सलवाद की समस्या ने हजारों जानें ली हैं, जिसमें सबसे अधिक नुकसान सुरक्षा बलों को उठाना पड़ा है। इन वर्षों में कई खूंखार नक्सली नेताओं ने सुरक्षाबलों को चुनौती दी, लेकिन अंततः उनका अंत हुआ। ऐसी ही एक
कहानी है बसवराजू की, जो भारत का सबसे खतरनाक और मोस्ट वांटेड नक्सली था।
कौन था बसवराजू?
बसवराजू उर्फ मल्लोजी उर्फ मानपुरा एक जाना-पहचाना नाम था नक्सलियों की दुनिया में। वह सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति का सदस्य और देश के वांछित नक्सलियों में से एक था। उस पर 1 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था और उस पर 150 से अधिक सुरक्षा बलों की हत्या का आरोप था। वह वर्षों से जंगलों में छिपकर नक्सल गतिविधियों का संचालन कर रहा था और छत्तीसगढ़, तेलंगाना, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आतंक का पर्याय बन चुका था।
70 घंटे का ऑपरेशन
सुरक्षा एजेंसियों को लंबे समय से बसवराजू की
तलाश थी। हाल ही में मिली गुप्त जानकारी के आधार पर सुरक्षा बलों ने एक बड़े ऑपरेशन की शुरुआत की, जो लगभग 70 घंटे तक चला। यह ऑपरेशन छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की सीमा से सटे जंगलों में चलाया गया। इस मिशन में CRPF, DRG (District Reserve Guard), STF और स्थानीय पुलिस की संयुक्त टीमों ने हिस्सा लिया।
ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा — घने जंगल, नक्सलियों द्वारा लगाए गए आईईडी, और बेहद सीमित विजिबिलिटी। लेकिन आधुनिक तकनीक, ड्रोन निगरानी और जवानों की हिम्मत ने इस मिशन को कामयाब बना दिया।
मुठभेड़ और बसवराजू का खात्मा
तीन दिनों तक चले इस ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच कई बार गोलीबारी हुई। अंततः, अंतिम दिन जंगल में घेराबंदी के बाद हुई भीषण मुठभेड़ में बसवराजू को मार गिराया गया। घटनास्थल से भारी मात्रा में हथियार, गोला-बारूद और नक्सली दस्तावेज बरामद किए गए।
बसवराजू की मौत नक्सली संगठन के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। वह संगठन की विचारधारा और रणनीतियों को गहराई से जानता था, और कई बड़े हमलों का मास्टरमाइंड रहा था।
उसकी करतूतें
बसवराजू को “रेड टेरर” का चेहरा माना जा
ता था। उसने बीते एक दशक में सुरक्षा बलों पर कई हमलों की योजना बनाई और उन्हें अंजाम दिया। वर्ष 2010 में दंतेवाड़ा में हुए हमले में 76 CRPF जवानों की मौत हुई थी, और कहा जाता है कि उसी हमले में बसवराजू की अहम भूमिका थी। इसके अलावा, झारखंड और ओडिशा में भी कई बड़े हमलों में उसका नाम सामने आया था।
सुरक्षा एजेंसियों की सफलता
इस ऑपरेशन को भारत की सुरक्षा एजेंसियों की एक बड़ी जीत माना जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री और राज्य सरकारों ने इस मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देने वाली टीम को बधाई दी है। इससे न केवल नक्सली संगठन को कमजोर किया गया है, बल्कि स्थानीय लोगों में भी विश्वास बढ़ा है कि सरकार और सुरक्षा बल नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया
बसवराजू की मौत की खबर से स्थानीय ग्रामीणों ने राहत की सांस ली है। सालों से जंगलों में छिपे नक्सली ग्रामीणों को डर और धमकी के बल पर इस्तेमाल करते रहे हैं। लेकिन अब लोगों को भरोसा है कि नक्सलवाद का अंत जल्द होगा और उनका जीवन फिर से सामान्य हो सकेगा।
आगे क्या?
हालांकि बसवराजू की मौत एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि नक्सली समस्या का पूरी तरह से समाधान अब भी बाकी है। सुरक्षा बलों और प्रशासन को जमीनी स्तर पर विकास लाना होगा — शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाएं देकर लोगों को मुख्यधारा से जोड़ना होगा।
सिर्फ ऑपरेशन से नहीं, बल्कि नीति, रणनीति और संवेदनशीलता से नक्सलवाद का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।








