स्कूल में दाख़िला और वो ख़्वाब: दिल्ली में एक रोहिंग्या बच्ची की कहानी
दिल्ली की तंग गलियों में एक छोटी सी झुग्गी बस्ती है, जहां सैकड़ों रोहिंग्या परिवार पिछले कुछ वर्षों से पनाह लिए हुए हैं। इस बस्ती में एक 10 साल की बच्ची रहती है—नाम है नूरा। उसके मासूम चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता है, जैसे उम्र से पहले ही ज़िंदगी ने उसे बहुत कुछ सीखा दिया हो।
नूरा का सबसे बड़ा सपना है स्कू
ल जाना। वो अक्सर अपनी बस्ती के बाहर से गुजरते बच्चों को स्कूल यूनिफॉर्म में देखती है और एक टक उन्हें निहारती रहती है। जब बच्चे हँसते हुए किताबों के बोझ से झुके हुए जाते हैं, नूरा की आंखों में एक चमक
आ जाती है। उसके लिए स्कूल सिर्फ पढ़ाई का स्थान नहीं, एक ऐसी दुनिया है जहाँ वो इंसान बन सकती है—आत्मसम्मान से जी सकती है।
शरणार्थी जीवन की हकीकत
नूरा का परिवार म्यांमार के रखा
इन राज्य से जान बचाकर भारत आया था। उन्हें वहाँ से इसलिए भागना पड़ा क्योंकि वे रोहिंग्या मुसलमान हैं—एक ऐसा समुदाय जिसे वहां के नागरिक नहीं माना जाता। नूरा के माता-पिता ने भारत आकर सोचा था कि यहाँ शांति होगी, सुरक्षा होगी, और शायद उनके बच्चों को बेहतर भविष्य मिलेगा।
लेकिन दिल्ली में ज़िंदगी भी आसान नहीं निकली। सरकारी पहचान-पत्रों के अभाव में वे बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहे—बिजली, पानी, और सबसे दुखद, शिक्षा। स्कूलों में दाख़िले के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ उनके पास नहीं थे। और जिनके पास कुछ था, उनके लिए भी नौकरशाही की जटिल प्रक्रिया एक दीवार बन गई।
स्कूल का सपना और सिस्टम की दीवार
नूरा ने कई बार अपने पिता से पूछा, “अब्बू, मैं स्कूल कब जाऊँगी?” और हर बार पिता की आंखें भर आतीं, लेकिन वो कुछ न कह पाते।
बस्ती में काम करने वाले एक एनजीओ कार्यकर्ता ने जब नूरा से उसकी पसंदीदा चीज़ पूछी, तो उसने बिना झिझक जवाब दिया—”किताबें।” वो सरकारी स्कूल के बाहर पड़े कचरे से पुराने पन्ने इकट्ठा करती और अपने टाट पर उन्हें बिछाकर अक्षर पहचानने की कोशिश करती।
एनजीओ के प्रयासों से आखिरकार नूरा का नाम एक सरकारी स्कूल में दर्ज हो गया, लेकिन दाख़िला होते ही मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। उसकी भाषा, कपड़े और पहचान उसे “अन्य” बनाते रहे। साथी बच्चे उसे ताने मारते, कभी-कभी शिक्षक भी झुंझला जाते।
लेकिन नूरा ने हार नहीं मानी।
उसने अपनी कमजोर हिंदी को सुधारने के लिए टीवी पर आने वाले बच्चों के कार्यक्रम देखना शुरू किया। उसने गणित के सवालों को दीवारों पर कोयले से हल करना सीखा। धीरे-धीरे, शिक्षकों ने भी उसकी लगन को पहचाना और उसे प्रोत्साहित करना शुरू किया।
एक बच्ची की हिम्मत, कईयों की प्रेरणा
नूरा की कहानी अकेली नहीं है। भारत में कई रोहिंग्या बच्चे हैं जो शिक्षा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन नूरा उन सभी की आवाज़ बन सकती है। उसके सपनों में सिर्फ उसकी दुनिया नहीं बदलनी है—वो चाहती है कि कोई भी बच्चा, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, या नागरिकता का हो, पढ़ाई से वंचित न रहे।
आज नूरा छठी कक्षा में है। उसके पास अब अपनी किताबें हैं, एक यूनिफॉर्म है, और सबसे जरूरी—एक आत्मविश्वास है। वह कहती है, “मैं बड़ी होकर टीचर बनूंगी, ताकि मैं दूसरे बच्चों को सिखा सकूं कि हार मानना कोई विकल्प नहीं होता।”
शिक्षा का अधिकार – सभी के लिए
यह कहानी भारत के शिक्षा अधिकार कानून (RTE) की प्रासंगिकता को भी उजागर करती है। यह कानून कहता है कि 6 से 14 साल तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा मिलनी चाहिए—चाहे वे किसी भी पृष्ठभूमि से हों। लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही है। पहचान-पत्र, निवास प्रमाणपत्र, और जातीय पहचान जैसे मुद्दे आज भी शिक्षा के रास्ते में रोड़े अटका रहे हैं।








