डोनाल्ड ट्रंप को समझना तो मुश्किल है ही, सीजफायर और टैरिफ के संबंध को समझना तो नामुमकिन है
डोनाल्ड ट्रंप—एक ऐसा नाम जो न केवल अमेरिकी राजनीति में बल्कि पूरी दुनिया में बहस और विवाद का केंद्र बना रहा। जब भी ट्रंप किसी नीति या बयान के साथ सामने आते हैं, तो विशेषज्ञों और आम लोगों दोनों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो जा
ती है। उनके द्वारा लिए गए फैसले पारंपरिक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यवहार से मेल नहीं खाते, और यही उन्हें “अपरंपरागत” नेता बनाता है।
लेकिन जब बात सीजफायर (युद्धविराम) और टैरिफ (आर्थिक शुल्क) जैसे गंभीर अंतरराष्ट्रीय विषयों की होती है, तो ट्रंप की सोच और भी ज्यादा उलझी हुई प्रतीत होती है। इस लेख में हम यही समझने की कोशिश करेंगे कि ट्रंप के इन दोनों पहलुओं को जोड़ने का क्या तात्पर्य हो सकता है, और क्या वाकई यह समझना संभव है कि वे किस दिशा में सोचते हैं?
ट्रंप की विदेश नीति की विशेषताएँ
डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति को तीन प्रमुख स्तंभों में बांटा जा सकता है:
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“America First” सिद्धांत – अमेरिका की प्राथमिकता पहले।
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आर्थिक राष्ट्रवाद – आयात शुल्क बढ़ाकर घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना।
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अपरंपरागत कूटनीति – जैसे किम जोंग उन से सीधा संवाद।
ये तीनों पहलू कहीं न कहीं एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन जब ट्रंप किसी देश के साथ सीजफायर पर बातचीत करते हैं और साथ ही उस पर भारी टैरिफ लगाते हैं, तो विरोधाभास स्पष्ट हो जाता है।
सीजफायर और टैरिफ: एक असामान्य संयोजन
सीजफायर यानी युद्धविराम का मकसद होता है संघर्ष या तनाव को कम करना, जबकि टैरिफ का मकसद अक्सर किसी देश पर आर्थिक दबाव बनाना होता है।
जब ट्रंप एक ओर उत्तर कोरिया या ईरान जैसे देशों से बातचीत की पहल करते हैं, और दूसरी ओर उन पर आर्थिक प्रतिबंध या टैरिफ थोपते हैं, तो यह कूटनीतिक दृष्टिकोण से उलझन भरा प्रतीत होता है।
उदाहरण:
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ट्रंप ने चीन के साथ व्यापार युद्ध छेड़ा जिसमें अरबों डॉलर के टैरिफ लगाए गए।
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इसी दौरान, उन्होंने चीन के साथ बातचीत और “डील” की संभावनाएं भी जताईं।
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ईरान पर उन्होंने सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए लेकिन कभी-कभी बातचीत की भी पेशकश की।
इस विरोधाभास का कारण शायद ट्रंप की “डीलमेकिंग” की शैली है, जो व्यापारिक दुनिया से आई है। वे कूटनीति को भी एक व्यापारिक सौदे की तरह देखते हैं, जिसमें दबाव बनाना सौदे का हिस्सा होता है।
ट्रंप की सोच: डील बनाम दबाव
डोनाल्ड ट्रंप के लिए हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दा एक व्यापारिक सौदे जैसा है। वे मानते हैं कि अगर वे एक देश पर टैरिफ लगाकर उसे दबाव में लाते हैं, तो वह देश सीजफायर या कोई अन्य डील करने के लिए मजबूर हो जाएगा।
परंतु यह सोच वैश्विक कूटनीति के संदर्भ में हमेशा काम नहीं करती। कई बार यह रणनीति उल्टा असर करती है:
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चीन ने भी अमेरिका के उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए।
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ईरान ने परमाणु डील से पूरी तरह दूरी बना ली और परमाणु कार्यक्रम तेज कर दिया।
इससे यह स्पष्ट होता है कि हर देश को व्यापारिक नजरिये से देखना एक सीमित सोच है, खासकर जब बात युद्ध और शांति की हो।
विशेषज्ञों की राय
राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ट्रंप की नीतियों को “गैर-पारंपरिक लेकिन प्रभावशाली” बताते हैं। कुछ इसे “अराजकता के माध्यम से नियंत्रण” (control through chaos) की रणनीति मानते हैं, जबकि कुछ इसे “अनिश्चितता पैदा करके दबाव बनाने” की चाल बताते हैं।
हालांकि, यह भी एक सच्चाई है कि कई मौकों पर ट्रंप की इसी शैली ने अमेरिका को आर्थिक लाभ भी दिलाया, जैसे कि चीन के साथ व्यापार समझौता (2020), लेकिन दीर्घकालिक दृष्टिकोण से ये समाधान टिकाऊ नहीं माने जाते।
क्या यह रणनीति काम करती है?
कुछ मामलों में ट्रंप की टैरिफ + सीजफायर रणनीति से अस्थायी परिणाम जरूर मिले, लेकिन इससे अमेरिका की वैश्विक छवि को नुकसान भी हुआ। सहयोगी देशों के साथ रिश्तों में दरार पड़ी और प्रतिद्वंद्वी देशों ने अमेरिका के खिलाफ रणनीतिक मोर्चेबंदी शुरू कर दी।








