मानव-केन्द्रित लेख: फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट का पर्दाफाश (999 शब्दों में)
MBBS बन बैठा ‘दि
ल का डॉक्टर’… 8 महीने में 50 हार्ट सर्जरी के बाद ऐसे बेनकाब हुआ फेक कार्डियोलॉजिस्ट
आज जब आप किसी अस्पताल में इलाज करवाने जाते हैं, तो सबसे पहले आपको यह भरोसा होता है कि डॉक्टर आपके जीवन की रक्षा करेगा। लेकिन जब वही डॉक्टर फर्जी हो, MBBS की डिग्री नकली हो, और ऑपरेशन थियेटर में आपकी जान से खिलवाड़ हो रहा हो, तो कल्पना कीजिए कि मरीज और उसके परिवार पर क्या बीतती होगी।
ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक नकली डॉक्टर ने खुद को कार्डियोलॉजिस्ट बताकर 8 महीनों में 50 से ज्यादा हार्ट सर्जरी कर डालीं।
कैसे हुआ खुलासा?
इस चौंकाने वाली सच्चाई का पर्दाफाश तब हुआ जब एक वरिष्ठ डॉक्टर ने सर्जरी के दौरान उस डॉक्टर की कार्यशैली पर शक जाहिर किया। उन्होंने अस्पताल प्रशासन को सूचित किया और फिर दस्तावेज़ों की जांच शुरू हुई।
जैसे ही दस्तावेज़ों की परतें खुलनी शुरू हुईं, सामने आया कि यह व्यक्ति किसी मेडिकल कॉलेज का छात्र भी नहीं रहा। MBBS की डिग्री फर्जी थी, मेडिकल काउंसिल में कोई रजिस्ट्रेशन नहीं था, और न ही उसके पास किसी प्रकार का मेडिकल ट्रेनिंग का प्रमाण था।
8 महीनों में 50 हार्ट सर्जरी — कैसे मुमकिन हुआ?
आश्चर्य की बात यह है कि इतने लंबे समय तक यह व्यक्ति कैसे अस्पताल में कार्यरत रहा और इतने गंभीर ऑपरेशन करने में सफल हो गया।
-
नकली पहचान पत्र और फर्जी अनुभव प्रमाणपत्रों के बल पर उसने भर्ती प्रक्रिया को पार किया।
-
उसकी बात करने की शैली और मेडिकल टर्म्स की जानकारी इतनी अच्छी थी कि किसी को संदेह नहीं हुआ।
-
उसे किसी योग्य डॉक्टर की टीम में जूनियर के रूप में रखा गया और धीरे-धीरे उसे स्वतंत्र रूप से सर्जरी करने की अनुमति मिल गई।
🩺 मरीजों की जान से हुआ खिलवाड़
इन 50 में से कई सर्जरी के दौरान जटिलताएं बढ़ीं और कुछ मामलों में मरीजों को पोस्ट-सर्जरी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
कुछ केस में तो मरीजों की स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उन्हें दूसरे अस्पताल रेफर करना पड़ा।
यह न केवल एक अपराध है, बल्कि मानवता के खिलाफ एक अमानवीय हरकत है
कानूनी कार्यवाही शुरू
जैसे ही मामला सामने आया, स्थानीय प्रशासन और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को सूचित किया गया।
आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया और उस पर IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाजी), और 307 (हत्या की कोशिश) के तहत केस दर्ज किया गया है।
इसके साथ ही अस्पताल प्रशासन पर भी सवाल उठने लगे कि इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हो गई।
हम क्या सीख सकते हैं?
इस केस से हमें कई जरूरी सबक मिलते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो अपने परिजनों को गंभीर बीमारी में अस्पतालों में भर्ती करते हैं।
1. डॉक्टर की पृष्ठभूमि की जांच करें:
आजकल हर डॉक्टर का मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन नंबर होता है। उसे वेबसाइट पर जाकर वेरिफाई करें।
2. संदिग्ध व्यवहार को नजरअंदाज न करें:
अगर डॉक्टर की जानकारी अधूरी लगे, सवालों से बचता हो, या इलाज के दौरान समझदारी न दिखाए, तो तुरंत अलर्ट हो जाइए।
3. अस्पतालों की जवाबदेही तय करें:
अगर कोई डॉक्टर भर्ती किया जाता है, तो उसकी योग्यता, अनुभव और कागज़ात की जांच अस्पताल का कर्तव्य होता है। इस लापरवाही की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
कैसे पहचानें फर्जी डॉक्टर?
-
मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन नंबर ना हो।
-
सिर्फ व्हाट्सऐप, कॉल या बिना नियुक्ति के इलाज करें।
-
ज्यादा टेक्निकल शब्दों का उपयोग करके भ्रमित करें।
-
बिल या पर्ची पर अस्पताल की मुहर न हो।
-
शक होने पर दूसरे डॉक्टर से राय जरूर लें (Second Opinion)।
मेडिकल फ्रॉड बढ़ता खतरा है
भारत में हर साल हजारों केस ऐसे सामने आते हैं जहां फर्जी डॉक्टर लोगों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करते हैं।
कम पढ़े-लिखे या ग्रामीण क्षेत्र के लोग, जो मेडिकल जानकारी नहीं रखते, वे ऐसे फ्रॉड का आसान निशाना बन जाते हैं।
अब वक्त है कि आम आदमी भी सजग हो, जागरूक हो, और किसी भी संदिग्ध स्थिति में सवाल पूछने से ना झिझके।








