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गोबर घोटाला! लाखों की हेराफेरी

चंद्रपुर में गोबर के नाम पर हुआ लाखों का घोटाला: जब वनरक्षकों ने रच दी गबन की साजिश

महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जिसने प्रशासन और आम जनता को झकझोर कर रख दिया है। यहां वन विभाग के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों ने मिलकर एक ऐसा घोटाला किया है, जिसे सुनकर कोई भी हैरान रह जाएगा। मामला है गोबर की खरीदारी में हुए लाखों रुपये के घोटाले का, जिसे ‘गोबर घोटाला’ कहा जा रहा है।

 क्या है गोबर घोटाला?

सरकार द्वारा जंगल क्षेत्र में जैविक खेती और प्राकृतिक खाद के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए गोबर की खरीद का बजट पास किया गया था। इसका उद्देश्य था कि गोबर को खाद के रूप में उपयोग कर जंगल क्षेत्र की भूमि की उर्वरता बढ़ाई जा

ए। इस योजना के तहत, स्थानीय स्तर पर गोबर की खरीद की जानी थी और उसका वितरण संबंधित परियोजनाओं में किया जाना था।

लेकिन इस योजना को कुछ वनरक्षकों और अधिकारियों ने मिलकर ‘सोने का अंडा देने वाली मुर्गी’ बना लिया। कागजों पर गोबर की भारी मात्रा में खरीद दिखाई गई, लेकिन हकीकत में सप्लाई ना के बराबर थी।

 दस्तावेजों से हुआ खुलासा

इस घोटाले का खुलासा तब हुआ जब एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ने RTI के माध्यम से जानकारी मांगी। इसके बाद जो दस्तावेज सामने आए, उसमें चौंकाने वाले तथ्य उभरकर आए। दर्जनों फर्जी बिल, बिना सप्लाई के भुगतान, एक ही ट्रांसपोर्टर से बार-बार गोबर खरीदने का दावा — ये सभी संकेत दे रहे थे कि अंदर ही अंदर कुछ बड़ा गड़बड़ चल रहा है।

एक स्वतंत्र ऑडिट में पाया गया कि जिन गांवों से गोबर खरीदा गया था, वहां इतनी मात्रा में गोबर उपलब्ध ही नहीं था। साथ ही, ट्रकों की संख्या, उनके नंबर और समय भी संदेह के घेरे में थे।

 कौन-कौन हैं इस घोटाले में शामिल?

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि

 इस साजिश में विभाग के कुछ रेंजर, वनपाल और क्लर्क शामिल हो सकते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, ₹35 लाख से अधिक की हेराफेरी सिर्फ एक वित्तीय वर्ष में हुई है।

सूत्रों की मानें तो इस घोटाले में शामिल अधिकारियों ने स्थानीय ट्रांसपोर्टरों और तथाकथित गोबर आपूर्तिकर्ताओं के साथ सांठगांठ की थी। इस पूरे मामले में अब तक चार कर्मचारियों के नाम सामने आ चुके हैं जिनसे पूछताछ की जा रही है।

 कार्रवाई की मांग तेज

घोटाले के सामने आने के बाद स्थानीय संगठनों औ

र नागरिकों ने प्रदर्शन करना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि सिर्फ निलंबन या चेतावनी से काम नहीं चलेगा — दोषियों पर आपराधिक मामला दर्ज कर न्यायिक जांच होनी चाहिए।

जिले के वरिष्ठ अधिकारियों ने जांच समिति का गठन कर दिया है और दावा किया है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

 व्यवस्था पर सवाल

इस घोटाले ने फिर से एक बड़ा सवाल खड़ा किया है — क्या सरकारी योजनाएं सच में ज़मीन तक पहुंच रही हैं? जब एक साधारण-सी योजना जैसे गोबर खरीद में भी फर्जीवाड़ा हो सकता है, तो बड़े बजट वाली योजनाओं में क्या हो रहा होगा?

इससे न केवल सरकारी तंत्र की साख को नुकसान पहुंचता है, बल्कि जनता का विश्वास भी टूटता है। सरकार की मंशा साफ होती है, लेकिन सिस्टम के कुछ भ्रष्ट कर्मचारी उस मंशा पर पानी फेर देते हैं।

 स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया

जब ये खबर गांवों में फैली, तो कई लोगों ने सामने आकर बताया कि उनके नाम पर गोबर सप्लाई दिखाया गया है, जबकि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। एक ग्रामीण ने बताया कि “हमारे गांव में तो मवेशियों की संख्या भी इतनी नहीं है कि इतनी मात्रा में गोबर मिल सके!”

 मीडिया की भूमिका

स्थानीय मीडिया और डिजिटल पत्रकारों ने इस घोटाले को उजागर करने में अहम भूमिका निभाई। लगातार रिपोर्टिंग, फील्ड विज़िट और RTI से निकली जानकारी ने प्रशासन को जांच के लिए मजबूर किया।

 अब आगे क्या?

अब जबकि मामला सामने आ चुका है, प्रशासन पर दोहरी जिम्मेदारी है — एक तरफ दोषियों को सजा दिलाना और दूसरी तरफ जनता के विश्वास को बहाल करना।

राज्य सरकार से भी मांग की जा रही है कि वह जिले के सभी वन विभागीय खर्चों का विशेष ऑडिट करवाए, जिससे और भी ऐसे घोटाले अगर हो रहे हों, तो समय रहते रोका जा सके।

 

Awaz Mazha
Author: Awaz Mazha

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