चंद्रपुर, महाराष्ट्र:
आखिरकार वह घड़ी आ ही गई जब चंद्रपुर के ग्रामीण इलाकों में मौत का पर्याय बन चुका ‘आदमखोर’ पिंजरे में कैद हो गया। बीते 13 दिनों में इस आदमखोर ने नौ मासूमों की जान ली, जिससे इलाके में दहशत का माहौल बना हुआ था। गांवों में सन्नाटा पसरा था, किसान खेतों में जाने से डरते थे, और बच्चे स्कूल छोड़ने लगे थे। लेकिन अब वन विभाग की सतत मेहनत और रणनीतिक कामयाबी ने इस डर के साये को कुछ हद तक खत्म कर दिया है।
आदमखोर के कहर की शु
रुआत
इस दहशत की शुरुआत लगभग दो हफ्ते पहले हुई, जब चंद्रपुर जिले के एक गांव में एक किसान की खून से सनी लाश मिली। पहले तो ग्रामीणों को लगा कि यह जंगली जानवर का हमला हो सकता है, लेकिन जब लगातार घटनाएं होने लगीं — कभी बकरी चराने गया बच्चा, कभी जलावन के लिए जंगल गई महिला — तब यह साफ हो गया कि कोई आदमखोर जानवर इलाके में सक्रिय है।
पहचान और पीछा
वन विभाग ने घटनास्थल की जांच की और पाया कि यह किसी बाघ का काम है। पंजों के निशान, बालों के सैंपल और सीसीटीवी फुटेज से स्पष्ट हुआ कि यह एक नर बाघ है जो इंसानों को निशाना बना रहा है। इसे ‘आदमखोर’ घोषित किया गया और तुरंत स्पेशल टाइगर कैप्चर यूनिट की मदद ली गई। विभाग ने बाघ की मूवमेंट ट्रैक करने के लिए जगह-जगह ट्रैप कैमरे लगाए, ड्रोन से निगरानी शुरू की और कई पिंजरे लगाए।
चालाकी और चुनौती
बाघ काफी चालाक निकला। वह हर बार पिं
जरे के पास आता, सूंघता और चला जाता। यहां तक कि एक बार तो उसने पिंजरे में बंधे बकरे को मारा, लेकिन खुद फंसा नहीं। वन विभाग को उसकी आदतें समझने में समय लगा। टीम ने इलाके के पुराने ट्रैकर्स और बाघ विशेषज्ञों को बुलाया और बाघ के व्यवहार को ध्यान में रखते हुए पिंजरे की जगह बदली, और अलग-अलग प्रकार के चारे का उपयोग किया।
13 दिन की थकाऊ जद्दोजहद
पूरे 13 दिन तक गांव-गांव में डर का माहौल बना रहा। कई ग्रामीणों ने अपनी खेती छोड़ दी, लोग घरों में कैद हो गए, और कई स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति घट गई। इस दौरान वन विभाग के लगभग 50 से अधिक कर्मचारियों की टीम ने 24 घंटे की शिफ्ट में काम किया। उनकी कोशिशें आखिर रंग लाई।
कैसे हुआ आदमखोर कैद?
गुरुवार की रात करीब 2:30 बजे आदमखोर बाघ एक पिंजरे
में बंधे बकरे की ओर खिंचा चला आया। चारे की गंध और पिंजरे की सावधानीपूर्वक प्लेसमेंट से वह भ्रमित हो गया और पिंजरे में घुसते ही ट्रिगर बंद हो गया। शेर दहाड़ा, लेकिन अब वह कैद हो चुका था।
वन विभाग के अधिकारियों ने तुरंत मौके पर पहुंचकर बाघ की जांच की। उसे सुरक्षित ट्रांसपोर्ट के जरिए चंद्रपुर के वन्यजीव बचाव केंद्र में भेजा गया, जहां उसकी मेडिकल जांच की गई और फिलहाल उसे ऑब्जर्वेशन में रखा गया है।
ग्रामीणों ने ली राहत की सांस
जैसे ही खबर फैली कि आदमखोर को पकड़ लिया गया है, गांवों में राहत की लहर दौड़ गई। लोग घरों से बाहर आए, मंदिरों में प्रसाद चढ़ाया गया और कई जगह पटाखे फोड़े गए। यह सिर्फ एक जानवर को पकड़ने की घटना नहीं थी, यह ग्रामीणों के मन से डर को खत्म करने वाला क्षण था।
वन विभाग की प्रतिक्रिया
चंद्रपुर के डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) श्री संजय ठाकरे ने बताया,
“यह मिशन काफी चुनौतीपूर्ण था। हमें स्थानीय लोगों का पूरा सहयोग मिला। हमने हर घटना को गंभीरता से लिया और वैज्ञानिक तरीके से काम किया। हमारा उद्देश्य था कि जानवर को बिना किसी नुकसान के पकड़ा जाए और मानव जीवन की रक्षा हो।”
बाघों की बढ़ती संख्या और मानव-वन्यजीव संघर्ष
चंद्रपुर जिला पहले से ही बाघों की उच्च जनसंख्या के लिए जाना जाता है। मानव बस्तियों के जंगलों के करीब बसने और बढ़ते अवैध रास्तों के कारण बाघों का मूवमेंट इंसानी इलाकों तक बढ़ गया है। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। वन विभाग को भी अब इस ओर विशेष नीति बनाने की आवश्यकता है।
क्या होनी चाहिए अगली रणनीति?
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बफर ज़ोन में सोलर फेंसिंग
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गांव वालों को नियमित जागरूकता प्रशिक्षण
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बाघों की निगरानी के लिए GPS कॉलर का उपयोग
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जंगल से लगे स्कूलों में सुरक्षा गार्ड्स की नियुक्ति







