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RBI रिपोर्ट: सरकारी या प्राइवेट बैंक?

क्या आप जानते हैं कि आपके बैंक अकाउंट की सुरक्षा किस हद तक उस बैंक के प्रकार पर निर्भर करती है?
भारत में जब भी बैंकिंग धोखाधड़ी (Bank Fraud) की बात होती है, तो लोगों के मन में एक ही सवाल उठता है – “सरकारी बैंकों में ज़्यादा फ्रॉड होते हैं या प्राइवेट बैंकों में?”

यह सवाल सिर्फ आम आदमी की जिज्ञा

सा नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और नागरिकों के विश्वास से भी जुड़ा हुआ है।

हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की एक रिपोर्ट ने इस विषय पर महत्वपूर्ण आंकड़े और तथ्यों को सामने लाया है, जो इस भ्रम को दूर करने में मदद कर सकते हैं।

 RBI की रिपोर्ट क्या कहती है?

RBI द्वारा जारी वार्षिक धोखाधड़ी रिपोर्ट (Annual Report on Frauds) के मुताबिक, सरकारी बैंकों (Public Sector Banks) में फ्रॉड के मामलों की संख्या और राशि, दोनों ही प्राइवेट बैंकों (Private Sector Banks) की तुलना में काफी अधिक है।

➤ आंकड़ों पर एक नजर:

  • 2022-23 में कुल बैंक धोखाधड़ी का 55% हिस्सा सरकारी बैंकों से संबंधित था।

  • प्राइवेट बैंकों में फ्रॉड के केस अधिक संख्या में जरूर दर्ज हुए, लेकिन उनमें गबन की राशि अपेक्षाकृत कम थी।

  • सरकारी बैंकों में फ्रॉड की औसतन रा

  • शि अधिक होती है — यानी कम केस लेकिन बड़ा नुकसान।

 किस तरह के फ्रॉड सबसे ज्यादा होते हैं?

RBI की रिपोर्ट के अनुसार, बैंकिंग फ्रॉड मुख्यतः निम्नलिखित प्रकार के होते हैं:

  1. क्रेडिट फ्रॉड (Loan Scam) – विशेष रूप से NPA में बदलने वाले बड़े कॉरपोरेट लोन।

  2. इंटरनेट और साइबर फ्रॉड – जैसे फिशिंग, ओटीपी चोरी, कस्टमर डेटा हैक।

  3. फर्जी दस्तावेज़ों पर लोन मंजूरी

  4. ATM और डेबिट कार्ड फ्रॉड

इनमें से अधिकांश मामलों में सुरक्षा तंत्र की कमजोरी, आंतरिक लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है।

 सरकारी बनाम प्राइवेट बैंक – क्या फर्क है?

✅ सरकारी बैंक (PSU):

  • लंबी प्रक्रिया, धीमा निर्णय तंत्र।

  • बड़े कॉर्पोरेट लोन देने की प्रवृत्ति।

  • आंतरिक नियंत्रण की कमी, पुराने सिस्टम।

  • कर्मचारी ट्रांसफर और कम निगरानी की वजह से जिम्मेदारी तय करना मुश्किल।

✅ प्राइवेट बैंक:

  • अधिक टेक्नोलॉजी-फ्रेंडली।

  • कस्टमर वेरिफिकेशन और इंटरनल ऑडिट सिस्टम मजबूत।

  • फ्रॉड की संख्या में बढ़ोतरी, लेकिन रकम सीमित।

प्राइवेट बैंकों में छोटे लेकिन अधिक संख्या में फ्रॉड होते हैं, जबकि सरकारी बैंकों में कम संख्या में बड़े फ्रॉड सामने आते हैं।

 कौन जिम्मेदार है इन फ्रॉड्स के लिए?

  • बैंक के अधिकारी: कई मामलों में जानबूझकर या लापरवाही से फ्रॉड को बढ़ावा मिलता है।

  • निगरानी एजेंसियों की लापरवाही: समय पर ऑडिट और सतर्कता न होना।

  • ग्राहकों की असावधानी: फर्जी कॉल, लिंक पर क्लिक, ओटीपी शेयरिंग।

इन सभी कारणों से एक व्यापक प्रणालीगत विफलता सामने आती है।

 समाधान क्या है?

✅ बैंकिंग सिस्टम के लिए:

  • AI-बेस्ड फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम अपनाना।

  • फ्रॉड अलर्ट डैशबोर्ड और ट्रैकिंग सिस्टम।

  • समय-समय पर साइबर ऑडिट।

✅ ग्राहकों के लिए:

  • OTP या बैंक डिटेल किसी के साथ शेयर न करें।

  • फेक कॉल्स और संदिग्ध लिंक से बचें।

  • बैंक स्टेटमेंट्स की समय-समय पर जांच करें।

✅ सरकार और RBI के लिए:

  • बैंक अधिकारियों की जवाबदेही तय करना।

  • सभी बैंकों के लिए फ्रॉड रिकवरी मेकेनिज़्म तैयार करना।

  • साइबर फ्रॉड के मामलों में सख्त दंडात्मक कार्रवाई।

 

 

 

 

 

 

Awaz Mazha
Author: Awaz Mazha

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