न पीने का पानी, न स्वच्छ शौचालय: राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को लिखा भावनात्मक पत्र
भारत जैसे उभरते राष्ट्र में जब डिजिटल इंडिया, चंद्रयान, और Viksit Bharat जैसे विषय चर्चा में हों, तब किसी बड़े नेता का इस बुनियादी मुद्दे की ओर ध्यान दिलाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी
को एक ऐसा पत्र लिखा है जो केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि देश के लाखों लोगों की आवाज़ बनकर सामने आया है।
पत्र का सार: “जनता की पीड़ा को समझिए”
राहुल गांधी ने अपने पत्र में सीधे-सीधे कहा कि “आज भी भारत के कई हिस्सों में लोग साफ़ पीने के पानी और स्वच्छ शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।”
उनके अनुसार, यह केवल विकास की असफलता नहीं बल्कि संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन है।
उन्होंने पत्र में जिन बातों पर ज़ोर दिया, वे इस प्रकार हैं:
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ग्रामीण क्षेत्रों में पीने योग्य पानी का न होना
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अस्पतालों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर गंदे और बदबूदार शौचालय
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सरकारी योजनाओं की धीमी क्रियान्वयन प्रक्रिया
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महिलाओं और बच्चों की सेहत पर इसका सीधा असर
क्या यह सिर्फ राजनीति है या हकीकत?
सवाल उठता है: क्या राहुल गांधी का यह पत्र महज़ एक राजनीतिक स्टंट है या वास्तव में जमीनी हकीकत की अभिव्यक्ति?
सच्चाई यह है कि भारत के कई राज्यों – खासकर झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश – में आज भी:
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महिलाएं दूर-दूर से पानी भरकर लाती हैं
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स्कूलों में शौचालय या तो बंद हैं या गंदगी से भरे
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अस्पतालों में मरीजों को पीने का सा
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फ़ पानी उपलब्ध नहीं
यह मुद्दे वोट बटोरने से कहीं ज़्यादा जनजीवन की गरिमा और स्वास्थ्य से जुड़े हुए हैं
शिक्षा और स्वच्छता: एक अनदेखा रिश्ता
राहुल गांधी ने पत्र में यह भी लिखा कि गंदे या अनुपलब्ध शौचालय की वजह से कई लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं।
एक UNICEF रिपोर्ट के अनुसार:
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भारत में हर 10 में से 4 लड़कियाँ उच्च कक्षा में प्रवेश नहीं ले पातीं
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कारण: विद्यालय में स्वच्छता का अभाव
यह बात विकास की गति पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है।
स्वास्थ्य सेवाओं की हालत
पत्र में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया
कि भारत के सरकारी अस्पतालों की हालत चिंताजनक है:
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गंदे शौचालय
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साफ पानी का न मिलना
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मच्छरों और बीमारियों की भरमार
स्वास्थ्य सेवा का यह स्वरूप किसी भी विकसित भारत की कल्पना से मेल नहीं खाता।
शौचालय निर्माण बनाम रखरखाव
प्रधानमंत्री मोदी की महत्वाकांक्षी योजना स्वच्छ भारत मिशन के तहत लाखों शौचालय बने।
लेकिन राहुल गांधी का तर्क यह है कि “शौचालय बनाना काफी नहीं, उनका रखरखाव और उपयोग सुनिश्चित करना ज़रूरी है।”
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कई जगह शौचालय बने लेकिन पानी नहीं है
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कई जगहों पर सफाई के अभाव में वे इस्तेमाल ही नहीं होते
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सरकारी स्कूलों में यह स्थिति अधिक गंभीर है
पानी की बात: बोरवेल या बोझ?
राहुल गांधी ने पीने के पानी के मुद्दे को बहुत ही संवेदनशील तरीके से उठाया:
“21वीं सदी के भारत में आज भी करोड़ों लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं, जिससे बीमारियाँ फैल रही हैं।”
National Health Profile के अनुसार:
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हर साल लाखों लोग डायरिया, टाइफाइड जैसी बीमारियों से पीड़ित होते हैं
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इसका सीधा संबंध असुरक्षित जल स्रोतों से है
राहुल गांधी की मांग क्या है?
उन्होंने पीएम मोदी से निम्नलिखित मांगें रखीं:
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राष्ट्रीय जल और स्वच्छता निगरानी प्रकोष्ठ (National Water & Sanitation Audit Cell) की स्थापना
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स्वच्छता अभियानों की निष्पक्ष ऑडिट
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प्रत्येक स्कूल और अस्पताल में जल परीक्षण और शौचालय की नियमित निगरानी
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जनभागीदारी के साथ ग्राम स्तरीय स्वच्छता समितियों का गठन
इन मांगों को यदि राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाए, तो यह बेहद व्यावहारिक और ज़रूरी सुधार हैं।
जनता क्या कह रही है?
सोशल मीडिया पर यह मुद्दा खूब चर्चित हो रहा है।
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कुछ लोग राहुल गांधी के पत्र को “जमीनी सच्चाई की अभिव्यक्ति” बता रहे हैं
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वहीं कुछ आलोचक इसे चुनावी चाल कह रहे हैं
हालांकि, आम जनता का एक बड़ा तबका मानता है कि मूलभूत सुविधाओं को लेकर ऐसी राजनीतिक जागरूकता जरूरी है।








