ईरान-इस्राइल संघर्ष पर डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिक्रिया: भ्रमित करने वाली बातें या कूटनीतिक रणनीति?
ईरान और इस्राइल के बीच बढ़ते त
नाव और संभावित युद्ध जैसे हालातों के बीच, दुनिया भर की निगाहें उन नेताओं पर टिकी हैं जिनकी नीतियों और वक्तव्यों से इस संघर्ष की दिशा प्रभावित हो सकती है। ऐसे में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बयान सामने आया है, जो जितना विवादास्पद है, उतना ही उलझाऊ भी।
डोनाल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में जब पत्रकार ने उनसे पूछा कि यदि वे दोबारा राष्ट्रपति बनते हैं और उस समय ईरान-इस्राइल युद्ध छिड़ा होता है तो वे क्या कदम उठाएंगे—तो ट्रंप का जवाब कुछ ऐसा था जिससे स्पष्टता कम और उलझन ज़्यादा पैदा हुई। उन्होंने कहा, “मैं क्या करूंगा ये किसी को नहीं पता… और शायद यही सबसे अच्छा है।” उनके इस बयान ने सोशल मीडिया से लेकर वैश्विक विश्लेषकों तक को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
ट्रंप की यह टिप्पणी न केवल अस्पष्ट थी बल्कि एक गहरे राजनीतिक और कूटनीतिक विवाद को जन्म देती है। क्या वे वास्तव में अपनी रणनीति को गोपनीय रखने की कोशिश कर रहे हैं या वे खुद इस मुद्दे पर असमंजस में हैं? आलोचकों का कहना है कि यह ‘जलेबी जैसी’ बयानबाजी है—जो दिखती सीधी है, पर अंदर से बेहद पेचीदा।
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में हालात बेहद संवेदनशील हैं। ईरान और इस्राइल के बीच हमलों और जवाबी हमलों की श्रृंखला ने क्षेत्रीय अस्थिरता को और बढ़ा दिया है। अमेरिका, जो पारंपरिक रूप से इस्राइल का सहयोगी रहा है, उसकी भूमिका इस टकराव में निर्णायक मानी जाती है। ऐसे में ट्रंप जैसे प्रभावशाली नेता का असमर्थतापूर्ण वक्तव्य न केवल भ्रम की स्थिति पैदा करता है बल्कि अमेरिका की भविष्य की विदेश नीति को लेकर अनिश्चितता भी बढ़ाता है।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप जानबूझकर ऐसे बयान देते हैं ताकि वे अपने विरोधियों को चौंका सकें और अपने समर्थकों को यह भरोसा दिला सकें कि उनकी रणनीति बाकी नेताओं से अलग है। लेकिन जब बात वैश्विक संघर्ष और संभावित युद्ध की हो, तो इस प्रकार की अस्पष्ट भाषा न केवल गैरजिम्मेदाराना मानी जाती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की साख को भी प्रभावित कर सकती है।
ट्रंप के समर्थक इस बयान को उनकी “रणनीतिक चुप्पी” बताते हैं। उनका मानना है कि ट्रंप इस समय स्पष्ट योजना बताकर ईरान या इस्राइल को कोई संकेत नहीं देना चाहते। वे मानते हैं कि ट्रंप की “अज्ञात रणनीति” ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। वहीं आलोचक कहते हैं कि जब बात युद्ध जैसे संवेदनशील मुद्दे की हो, तो लोगों को यह जानने का हक है कि उनके नेता की प्राथमिकता क्या होगी—संघर्ष को रोकना या युद्ध में कूद जाना?
ट्रंप का यह बयान 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की दृष्टि से भी अहम है। विदेश नीति और वैश्विक सुरक्षा हमेशा अमेरिकी मतदाताओं के लिए एक बड़ा मुद्दा रही है। ऐसे में एक संभावित राष्ट्रपति उम्मीदवार का यह कहना कि “मैं क्या करूंगा किसी को नहीं पता”, उसे एक जिम्मेदार नेता की छवि से दूर ले जा सकता है।
ईरान और इस्राइल के इस संभावित युद्ध पर नज़र डालें तो यह केवल दो देशों का मसला नहीं है। इसका असर पूरी दुनिया की शांति, तेल की कीमतों, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और कूटनीतिक समीकरणों पर पड़ेगा। इसलिए हर वैश्विक नेता की टिप्पणी मायने रखती है। ऐसे में ट्रंप की “जलेबी जैसी बात” दुनिया को आश्वस्त करने की बजाय चिंता में डालती है।
संक्षेप में कहा जाए तो ट्रंप का यह बयान सिर्फ एक लाइन नहीं बल्कि कई सवालों का जवाब मांगता है—क्या वे सच में रणनीतिक हैं या बस ध्यान भटकाने की कोशिश? क्या वे वैश्विक स्तर पर अपनी साख बनाए रखने में सक्षम हैं? और सबसे अहम, क्या अमेरिका की विदेश नीति ऐसे बयानों के भरोसे छोड़ी जा सकती है?







